रंग और उल्लास से भरा ‘होली’ का त्यौहार, जानें सम्पूर्ण विवरण

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होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है. होली रंगों से भरा होने और खुशियाँ मनाने का त्यौहार है. इस बार 2 मार्च को होली का पर्व मनाया जाएगा. फाल्गुन माह में होली के एक दिन पहले होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है.

होलिका का शुभ मुहूर्त- होली के एक दिन पहले शाम को होलिका दहन किया जाता है. इस बार होलिका दहन 1 मार्च को है जिसका मुहूर्त शाम 6 बजकर 26 मिनट से लेकर 8 बजकर 55 मिनट तक रहेगा.

होली कब मनाई जाती है- होली वसंत ऋतु में फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहा जाता है. यह त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरम्भ हो जाता है. वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंतोत्सव और कामोत्सव भी कहते हैं.

होली क्यों मनाई जाती है- वैसे तो कई कथाएं कही जातीं हैं पर सबसे ज़्यादा प्रहलाद और होलिका की कथा प्रचलित है. प्रहलाद श्रीहरी विष्णु का परम भक्त था. प्रहलाद का पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप नास्तिक और निरकुंश था. उसने अपने पुत्र प्रहलाद से विष्णु भक्ति छोड़ने के लिए कहा लेकिन प्रहलाद ने अपनी विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी. इसके पश्चात हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे प्रहलाद की भक्ति को देखते हुए उसे मरवा देने का फैसला कर लिया. परन्तु हिरण्यकश्यप की सारी कोशिश विफल रही. इसके बाद हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को यह कार्य सौंपा. हिरण्यकश्यप की बहन को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में कभी जल नहीं सकती. हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर जलती हुई आग पर बैठ गई. आग में बैठने से होलिका तो जल गई, लेकिन प्रहलाद बच गया. इसी उपलक्ष में यह पर्व मनाया जाता है. प्रहलाद का अर्थ आनंद होता है. वैर व उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है, प्रेम और उल्लास का प्रतीक प्रहलाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है. इसलिए यह त्यौहार मनाया है.

होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है- होली का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. होली त्यौहार की परम्पराएँ भी अत्यंत पुरानी है. प्राचीनकाल में शादीशुदा महिलाओं द्वारा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए यह मनाया जाता था और पूर्ण चन्द्र की पूजा करने की परंपरा थी. वैदिक काल में इसको नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था. उस दौरान खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लिया जाता था. अन्न को होला भी कहते हैं, इसलिए इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा.

होली का पहला काम झण्डा या डंडा गाड़ना होता है, झंडे या डंडे को किसी सार्वजनिक स्थल में गाड़ा जाता है. इसके लिए काफी दिन पहले से ही यह तैयारियां शुरू हो जाती हैं. होली का पहला दिन होलिका दहन कहलाता है. इस दिन चौराहों पर आग के लिए लकड़ी इकट्टी की जाती है और होली जलायी जाती है. इसमें प्रमुख रूप से लकड़ियाँ और उपले होते हैं. लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली की पूजा सुबह से ही शुरू हो जाती है. घरों में पकवान बनाए जाते हैं और उनका यहाँ भोग लगाया जाता है. शाम को मुहूर्त के अनुसार होली का दहन किया जाता है. इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को सेंका जाता है. होलिका दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है. यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है. लोग देर रात तक नाचते-गाते और आनंद उठाते हैं.

होली के अगले दिन को धूलंडी कहते हैं. इस दिन रंगो से खेला जाता है. सुबह ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने पहुँच जाते हैं, गुलाल व रंगो से फिर स्वागत किया जाता है और पकवान खिलाये जाते हैं. इस दिन सतरंगी रंगों के साथ सात सुरों का अनोखा संगम देखने को मिलता है. रंगों से खेलते समय मन में खुशी, प्यार और उमंग आ जाती है. यह त्यौहार दुश्मनी को दोस्ती के रंग में रंगने वाला त्यौहार है. बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं. सभी होली के रंग में एक समान दिखते हैं. रंग से खेलने के बाद दिन तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं. होली के दिन खीर, पूरी, मिठाइयाँ आदि व्यंजन बनाए जाते है. इस त्यौहार पर कांजी, भांग प्रमुख पेय है.

कहाँ मनाया जाता है- होली त्यौहार विशेषकर भारत में मनाया जाता है, लेकिन इसकी धूम विदेशों में भी है. ब्रज की लठमार होली सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में खासतौर पर बहुत प्रसिद्ध है. यहाँ पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और फिर महिलाएँ उन्हें लठियों व कपड़ों के बनाये गए कोड़ों से मारती हैं. इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन मे भी 25 दिनों तक यह त्यौहार मनाया जाता है. कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं. यह होली के कई दिनों पहले ही शुरू हो जाता है. हरियाणा में धुलंडी के दिन भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की परंपरा है. महाराष्ट्र में रंग पंचमी के दिन सूखा गुलाल खेलने और गोवा के शिमगो में जुलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिखों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है.
 



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