राज कुमार गुप्ता: भारतीय समाज का दर्पण “होली”

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भारतीय संस्कृति में त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही काफी महत्व रहा है. हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी खासियत है कि यहाँ पर मनाये जाने वाले सभी त्यौहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्भावना को बढ़ाते हैं. या यूँ भी कह सकते हैं कि यहाँ मनाये जाने वाले त्योहार यहाँ की संस्कृति का दर्पण होते हैं. यहाँ पर पर्व सिर्फ पर्व न होकर बल्कि एक मौका होता है. अवसर दूरियां घटाने का...बिछड़ों को करीब लाने का...भूले हुए को अपनाने का

यहाँ त्योहारों एवं उत्सवों का लेना-देना किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है. यहाँ मनाये जाने वाले सभी त्योहारों के पीछे की भावना मानवीय गरिमा को समृद्धि प्रदान करना होता है. इसी वजह से भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों एवं उत्सवों में सभी धर्मों के लोग आदर के साथ मिलजुल कर सम्मिलित होते हैं. 

होली भारतीय समाज का एक प्रमुख पर्व है, जिसकी लोग बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं. होली भारत के सबसे पुराने पर्वों में से एक है. हिन्दुस्तानी त्योहारों के पीछे कोई न कोई ऐसी कथा जरूर होती है, जो आदमी को इंसान बनाने की राह ले जाती है. इसी हफ्ते उत्तर भारत के लोग होली का त्योहार मनाएंगे. यह सिर्फ रंगों, गुझियों, पकवानों का नहीं, बल्कि पाप और नफरत के दहन का पर्व भी है. हम शताब्दियों से होलिका इसलिए जलाते आए हैं, ताकि साल में कम से कम एक बार अग्नि की प्रदक्षिणा कर अपनी और आसपास की बुराइयों से जूझने का संकल्प ले सकें. यह ऐसा त्योहार है, जो अकेले नहीं मनाया जा सकता. हंसते-खेलते कटुताओं को आग के हवाले कर देना हमारी परंपरा है. होली की हर कथा में एक समानता है कि उसमें 'असत्य पर सत्य की विजय' और 'दुराचार पर सदाचार की विजय' का उत्सव मनाने की बात कही गई है. इस प्रकार होली मुख्यतः आनंदोल्लास तथा भाई-चारे का त्यौहार है. यह लोक पर्व होने के साथ ही अच्छाई की बुराई पर जीत, सदाचार की दुराचार पर जीत व समाज में व्याप्त समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है. 

ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता व दुश्मनी को भूलकर एक-दूसरे के गले मिलते हैं और फिर हमेशा के लिए दोस्त बन जाते हैं. राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व बसंत का संदेशवाहक भी है. होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं अपितु मुसलमान लोग भी मनाते हैं. इसका सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें मुगलकाल की हैं और इस काल में होली के क़िस्से जिज्ञासा जागृत करने वाले हैं. इन तस्वीरों में अकबर को जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर को नूरजहाँ के साथ होली खेलते हुए दिखाया गया है. शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज ही बदल गया था. इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के जमाने में होली को 'ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी' (रंगों की बौछार) कहा जाता था. अंतिम मुगल बादशाह शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाते थे. 

होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैं पर अंतत: इस पर्व का उद्देश्य मानव-कल्याण ही है. लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोक-कथाओं, क़िस्से-कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है. 

मेरी सोच के अनुसार, वास्तव में हमारे द्वारा होली का त्यौहार मनाना तभी सार्थक होगा जब हम इसके वास्तविक महत्व को समझकर उसके अनुसार आचरण करें. इसलिए वर्तमान परिवेश में अत्यंत जरूरत है कि इस पवित्र त्यौहार पर आडम्बर की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण होगा. तो आयें...इस बार होली की सार्थकता को सिद्ध करें.



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