कविता: ये सुबह है

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बीत गयी ना रात काली अब सुनहरी सुहानी ये सुबह है
दे नए पर्व को आगाज़ झूमती गाती मतवाली ये सुबह है

किया तो होगा परेशां किसी तनाव तकरार ने तुझे भी
यकीं तुझे दिलाती हाथ प्यार का बढ़ाने वाली ये सुबह है

मिली हर हार कईं बार तुझे दरकार विजयी लम्हों की है
वहीं प्यास नयी आस नए अरमान जगाने वाली ये सुबह है

याद में अँगड़ाई बहुत ली भूला न गीत मुहब्बत के कभी तू
लड्डू खाये राधा बुलाये माखनचोर को निराली ये सुबह है

ना आयी तुझे नींद कुछ रात पता है मधुर दिल के स्वामी
कर बहुत काम ना कर आराम हाँ सुकूँ वाली ये सुबह है

छू नए आयाम कर सुविचार लिए मीठी सी उमंग दिल में
कि रहे फ़र्ज़ का अहसास ही याद दिलाने वाली ये सुबह है

चल ज़रा ठहर पी चाय दे विराम और हो तैयार फिर से तू
पाली में कर श्रम धूम दिल्ली की मचाने वाली ये सुबह है
                                                                                                                                                                                                                     -योगेंद्र खोखर



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