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मोक्ष प्राप्ति का अंतिम और सर्वोपरि स्थान है “गया”, यहाँ आत्मा होती है पापमुक्त

“मोक्ष” यह एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ बहुत गहरा है. कहते हैं मरने के बाद आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होना आवश्यक है. हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध आवश्यक माना जाता है. मान्यता है कि अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण न किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती. यह मुक्ति ही मोक्ष कहलाती है. 17 सितम्बर से श्राद्ध का पावन महिना शुरू हो रहा है और देश में श्राद्ध के लिए 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है, जिसमें गया सर्वोपरि है. कहा जाता है कि भगवान राम और सीता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था. 

भगवान विष्णु का नगर मानी जानी वाली ‘गया’ नगरी मोक्ष की भूमि कहलाती है. विष्णु पुराण और वायु पुराण में इसका उल्लेख किया गया है. पुरानी कहानियों के अनुसार भस्मासुर के वंश में गयासुर नामक राक्षस ने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया. उसने वरदान मांगा कि उसका शरीर पवित्र हो जाए. लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जाएं. ब्रह्माजी से वरदान पाकर लोग बिना किसी भय के पाप करने लगे और गयासुर के दर्शन कर पाप मुक्त होने लगे. इससे बचने के लिए देवताओं ने यज्ञ के लिए गयासुर से पवित्र स्थल की मांग की. इस पर गयासुर ने अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया. जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया.


यही पांच कोस की जगह आगे चलकर गया बनी, परंतु गयासुर के मन से लोगों को पाप मुक्त करने की इच्छा नहीं गई. उसने देवताओं से वरदान मांगा कि यह स्थान लोगों को मुक्ति देने वाला बना रहे. जो भी मनुष्य यहां पर किसी का तर्पण करने की इच्छा से पिंडदान करे, उन्हें मुक्ति मिले. गयासुर की वजह से ही आज गया एक पवित्र और मोक्ष प्रदान करनी वाली नगरी बन गई है. आज भी लोग अपने पितरों को तारने के लिए गया आते हैं और हमेशा आते रहेंगे क्यूंकि मोक्ष की प्राप्ति सभी का अंतिम लक्ष्य है. 



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