भक्ति साची तभै...आडम्बर रहित होये– राजकुमार गुप्ता

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आजकल लोग जो भी करते हैं उसकी खबर सोशल मीडिया के जरिये सभी जगह पहुँच जाती है. जन्म से लेकर मरण तक, सभी कुछ सोशल मीडिया पर पहुँच जाता है. कुछ ही दिनों में नवरात्रि का पर्व आने वाला है. नवरात्रि हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले सबसे बड़े और महत्वपूर्ण उत्सवों में से एक है, जिसे सम्पूर्ण भारत में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है. वैसे तो एक वर्ष में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ के महीनों में कुल मिलाकर चार बार नवरात्र आते हैं लेकिन चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र काफी लोकप्रिय हैं. 

माना जाता है इन दिनों भक्त गण अपने घर माँ दुर्गा का दरबार लगाते हैं, घट स्थापना करते हैं, श्रद्धा भाव से पूजा आदि करते हैं. आठ दिनों की पूजा के बाद नौवे दिन कंजिकों को भोजन कराया जाता है जिसमें उन्हें हलवा, चना और पूरी का प्रसाद दिया जाता है. माना जाता है इस दिन घर आने वाली नौ कन्याएं देवी के नौ स्वरूपों के समान होती हैं और उनका सेवा सत्कार करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं साथ ही मनचाही मुराद पूरी करती हैं.

इसके अलावा नवरात्रों में जो चीज़ अत्यधिक महत्वपूर्ण है वो है उपवास. कुछ लोग अखंड उपवास रखकर देवी को प्रसन्न करने की चेष्ठा करते हैं. कुछ लोग मन में श्रद्धा भाव धारण कर नवरात्रों में मास-मछली का सेवन बंद कर देते हैं. वहीँ कुछ लोग प्रारंभ में एक व्रत रखकर उसके बाद अंत में एक व्रत रखकर इसका पालन करते हैं. तो वहीँ कुछ लोग नौ दिन केवल फल आदि पर ही जीवित रहते हैं, वहीँ कुछ लोग केवल नींबू पानी पीकर अपना दिन व्यतीत करते हैं.

वैसे तो आप जैसे चाहे वैसे उपवास रख सकते हैं. व्रत रखने के कोई मापदंड तय नहीं हैं, परन्तु कुछ लोग व्रत के नाम पर झूठा दिखावा करते हैं. मेरे एक मित्र हैं, नवरात्रों में वो उपवास रखते हैं, खूब पूजा-पाठ करते हैं. लेकिन उपवास के नाम पर पूरे दिन किसी न किसी की बुराई करते हैं, उपवास के नाम पर कुछ न कुछ मुंह को लगाते रहते हैं. यहाँ ही उनकी श्रद्धा की सीमा खत्म नहीं होती. जब हम कुछ खाने के लिए कहते हैं तो भाईसाहब कहते हैं कि ‘आज मेरा नवरात्री का फ़ास्ट है’. पूरा दिन मेरा उन्हें देख कर ही गुजर जाता है कि अगर उपवास में ये सब होता है तो फिर अन्य दिनों में फर्क ही क्या? 

उपवास का अर्थ होता है पूरी तन्मयता के साथ प्रभु की आराधना करना, मुंह से किसी को कोई अपशब्द न कहना. किसी पशु-पक्षी-मानव या किसी भी जीवित वस्तु की भावनाओं को आहत न करना. अपने दिन के सभी दैनिक कार्य करना लेकिन भगवान की भक्ति में लीन रहकर. लेकिन आज कल इस लोभ रूपी संसार में डूबकर लोग अपने नैतिक मूल्यों से भटक गये हैं. व्रत रखकर सारा दिन खाते रहना, आध्यात्म से दूर रहना आदि. 

मेरी नजर में अगर इसे ही भक्ति करना कहते हैं. अगर इसे ही पूजा-पाठ कहते हैं, अगर इसे ही उपवास करना कहते हैं, तो व्यर्थ है ये झूठा ढ़ोंग. झूठ है सब कुछ, चेहरे पर झूठ और धोखे का नकाब क्यूँ लगाना. ऐसा करने से हम किसी दूसरे को नहीं बल्कि स्वयम को धोखा देते हैं और जो इन्सान स्वयं से झूठ बोले वो सच्ची भक्ति कैसे कर सकता है.   

देखा जाए तो श्रद्धा मन से होती है, व्यर्थ के आडम्बरों से नहीं. इसलिए इस नवरात्री पर माँ की सच्ची और अच्छी भक्ति करें, उपवास तो करें लेकिन उसमें झूठ न होकर सच्ची भक्ति हो. आप उपवास करें परन्तु अपनी क्षमता के अनुसार.
 



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