कविता: सड़क

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निःशब्द हो जाता है मन सड़क के मूड़ स्विंग्स को देखकर कि देखो क्या गरीबी है?

हालात-ए-ग़रीबी भयंकर जिधर देखो गाड़ियों की ये लंबी पंक्तियाँ लगी हैं.

 

यहीं वो बसें हैं जिनमें खचाखच हालात में घंटों जाम लगा करते थे कभी,

घुस पाना जितना कठिन था निकल पाना और दुष्कर था याद है अभी.

 

ज़रा मौका मिलते ही दौड़ती बस है जो चढ़ सकती है कभी भी तेरी कार पर यकायक,

कोई रोकने वाला नहीं लगी है मेट्रो युग में पछाड़ने में एक दूसरे को सरपट.

 

है जल्दी में तू भी तो गाली उस मोटर साइकिल वाले को क्यूँ दिए जाता है?

सड़क पर केवल किसी एक का हक़ नहीं है सड़क उसकी भी यह क्यूँ भूल जाता है.

 

                                                                                                     योगेंद्र खोखर



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