छोटी उम्र में घिनौनी होती जा रही बच्चों की मानसिकता – राज कुमार गुप्ता

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क्या हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारे बच्चों के मन में क्या चल रहा है? घर-परिवार, स्कूल और समाज को कहीं वे अपने दुश्मन की तरह तो नहीं समझने लगे हैं? यदि वे ऐसा करते हैं तो इसके लिए उन्हें इकतरफा तौर पर दोषी नहीं समझना चाहिए. आंख खोलने के साथ ही वे खुद को दुनिया भर की अपेक्षाओं से घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं. तीन साल का होते ही प्ले-स्कूल और पांच साल पार करने से पहले ही मोटा डोनेशन मांगने वाले स्कूल में जाना उनकी नियति बन चुकी है. इतने छुटपन में ही उनमें से अधिकतर को रोज नहीं तो महीने में कम से कम एक बार टीचर और मां-बाप, दोनों के सामने बेईज्ज़त होना पड़ता है PTA के रूप में.

संयुक्त परिवार अब संयुक्त रहे नहीं, भाई-बहन अमूमन होते नहीं और मां-बाप अपने-अपने प्रोफेशनल प्रेशर से गुजर रहे होते हैं. ऐसे में बच्चों की बात सुनने, उनके मन के घावों पर मरहम लगाने के लिए कोई होता ही नहीं. लगातार बजती खतरे की घंटियां यह मांग कर रही हैं कि कम से कम आठवीं पास करने तक बच्चों की शिक्षा और पैरंटिंग, दोनों की कार्यसूची में पहला बिंदु उनको स्ट्रेस-फ्री रखने का बनाया जाए. ऐसा कदम सरकारें ही उठा सकती हैं, परन्तु उन्हें तो अपने राजनीतिक मापदंड के तहत सिलेबस बदलने से ही फुर्सत नहीं.

मेरी नज़रिया कहता है कि नन्हीं सी उम्र में बच्चों पर उम्मीदों का इतना बोझ न डाला जाए कि वो खुद को घृणित समझ कोई गलत कदम न उठाये. आप खुद सोचकर देखिये वो छोटे बच्चे सिर्फ इसलिए टीचर को मार देते हैं कि उन्हें स्कूल से छुट्टी मिल जाए और कुछ तो इसलिए भी कि पेपर कैंसिल हो जाए. एक दौर था जब बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी स्कूल जाते थे. पर आज उन्हें स्कूल जाने में इतनी समस्या क्यूँ आ रही है? कहीं उन्हें स्कूल में किसी ऐसे दौर से तो नहीं गुजरना पड़ रहा जो अमानवीय हो. 



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