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लापरवाही से इलाज़ बना जी का जंजाल-राज महाजन

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आपने वो कहावत तो सुनी होगी ‘ऊंची दुकान फीका पकवान’. इस कहावत को चरितार्थ किया है देश के जाने-माने अस्पताल MAX ने. 30 नवम्बर को एक महिला माँ बनी और उसने जुड़वाँ बच्चों को जन्म दिया- एक लड़का और एक लड़की. लेकिन शालीमार बाग स्थित अस्पताल ने कहा- दोनों बच्चे वक्त से पहले पैदा हुए इसलिए मर गए. दुखी पिता उन बच्चों को दफनाने ले जा रहा था. तभी एक बच्चे का हाथ हिलता है और उसके शरीर में कुछ हरकत होने लगती है. इसके बाद परिवार वाले अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगाते हैं. ये था मामला जिसने प्रतिष्ठित अस्पातल की प्रतिष्ठा को दागदार कर दिया. हंगामा होता देख अस्पताल प्रशासन ने इस मामले से सम्बंधित दोनों डॉक्टर्स को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया. परन्तु क्या इतना ही काफी था. इसके बाद अस्पताल की तरफ से एक और बड़ी गलती हुई. गलती थी जो बच्चा बचा उसे सही से इलाज़ मुहैया न कराना. जिसके वजह से कुछ दिन बाद दुसरे बच्चा भी दम तोड़ देता है.

वैसे हिंदुस्तान का नम्बर उन देशों में आता है जहां स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बहुत कम होता है. भारत में यह डेढ़ प्रतिशत से भी कम है, जबकि चीन में तीन फीसद से ज्यादा. इसी कारण हिंदुस्तान में सार्वजनिक चिकित्सा प्रणाली हमेशा संसाधनों और कर्मियों की तंगी से जूझती रहती है. फिर, भ्रष्टाचार और बदइंतजामी की मार ऊपर से. इसके अलावा सबसे बड़ी बीमारी है ‘लापरवाही और संवेदनहीनता’. यह सरकारी अस्पतालों में भी दिखती है और निजी अस्पतालों में भी. सरकारी अस्पताल की निष्ठुरता का एक बड़ा उदाहरण गोरखपुर में जापानी बुखार से पीड़ित सैकड़ों बच्चों की मौत के रूप में आ चुका है. निजी अस्पताल भी कम संवेदनहीन नहीं है, और इसके दो ताजा प्रकरणों ने सबको हैरान कर दिया है. कुछ दिन पहले एक निजी अस्पताल ने डेंगू से पीड़ित एक बच्चे के इलाज का सोलह लाख रुपए का बिल उसके माता-पिता को थमाया. उस बच्चे की मौत भी हो गई. इसकी खबर आई तो निजी अस्पतालों में होने वाली लूट कुछ वक्त के लिए चर्चा का विषय बनी, वरना निजी अस्पतालों पर नाजायज बिल वसूले जाने की शिकायतें रोज सुनने में आती हैं, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती. 

ताज़ा मामले में तो हद ही हो गई. इस प्रकरण ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि देश में इलाज़ के नाम पर आखिर हो क्या रहा है? 

ध्यान दें है कि पिछले दिनों दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने जुड़वां नवजात बच्चों को मृत घोषित कर दिया. इनमें से एक बच्चा बाद में जीवित निकला. इस पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिलाया है, वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी इस मामले को काफी दुखद बताते हुए जरुरी कार्रवाई के आदेश दिए हैं. 

मामले के बाहर आने के बाद तो सभी तरह की कार्रवाही का विश्वास दिलाया जा रहा है. परन्तु यहाँ मेरे दिमाग में एक ही प्रश्न खलबली मचाये हुए है कि इलाज में बरती जाने वाली लापरवाही और इलाज के बीच या इलाज के बहाने होने वाली लूट को रोकने के लिए व्यवस्थागत उपाय क्या है? किसी की ज़िन्दगी चली जाती है, किसी के घर का चिराग बुझ जाता है और कोई इलाज़ में अपने जीवन भर की जमापूंजी गवां बैठता है लेकिन फिर भी अपने को बचा नहीं पाता.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ही डॉक्टरी को सेवा न समझकर पैसे उगाही की मशीन समझ लिया है अपितु पश्चिम में भी निजी अस्पताल कमाई करते हैं. पर भारत से तुलना करें, तो दो फर्क है. वहां सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था की साख कायम है. दूसरे, निजी अस्पतालों की बाबत नियमन के कायदे सख्त हैं. पेशेवर नैतिकता क्या होती है? इस सम्बन्ध में भारत उनसे सीख ले तो न तो इतनी संवेदनहीनता होगी और न ही इतनी लापरवाही से जानें जायेंगी. 

मेरे नजरिये की सीमा भी यही कहती है कि भारत में चिकित्सा के इस पेशे को और अधिक संवेदनशील बनना होगा वरन वो दिन दूर नहीं जब भगवान का दर्जा पाने वाले डॉक्टर्स शैतानों की जमात में शामिल होंगे. अवल तो दिल्ली सरकार ने MAX का लाइसेंस रद्द कर दिया है. देखा जाए तो यह क़दम काफी नहीं हैं. हाँ, इतना जरूर कह सकता हूँ इस क्षेत्र में ये क़दम सराहनीय है.



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