गर्भ का अधिकार सिर्फ स्त्री का होना चाहिए – राज महाजन

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हमारे देश में या यूँ कहें हमारे समाज में पति को भगवान का दर्जा दिया जाता है. उसे परिवार का पालनकर्ता मानने की परंपरा सदियों से चलती आई है. इस तरह की अधूरी मान्यताओं ने पत्नी को कई मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर रखा है. उसके अधिकारों का हनन किया है.

सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए कहा कि पत्नी को गर्भपात के लिए पति की इजाजत की जरूरत नहीं है. इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क दिया है कि इससे पति पत्नी के रिश्ते और अधिक न्यायपूर्णता आएगी. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा पत्नी अपनी मर्जी से इस बारे में निर्णय कर सकती है. इस मामले में पति ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने साफतौर पर कहा था कि गर्भपात का निर्णय पत्नी का विशेषाधिकार है.

सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की बल्कि इस मामले में कानूनी स्थिति को पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा साफ कर दिया.ज्ञात हो कि जिस केस के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया है उस मामले में पति और पत्नी के रिश्ते पहले से खराब चल रहे थे. तलाक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी. लोक अदालत के प्रयास पर दोनों ने दोबारा साथ रहना शुरू किया. कुछ वक्त बाद पत्नी को प्रेग्नेंसी का पता चला, पर दोनों के बीच अच्छे संबंध की गुंजाइश न देखते हुए उसने अबॉर्शन का निर्णय किया.

पति ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद पत्नी ने उसकी मर्जी के बगैर ही अबॉर्शन करा लिया. पत्नी के इस फैसले से गुस्साए पति ने पत्नी, साले और ससुर सहित हॉस्पिटल के डॉक्टर्स पर 30 लाख रुपये का दावा ठोंक दिया. दावे में पति ने कहा था कि पत्नी की इस हरकत से उसे पति मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ा. एक बच्चे को खोने का दर्द बहुत पीड़ाददायक होता है. मेरे मना करने पर भी उसने हमारे बच्चे को मार दिया जोकि सर्वथा गलत है.

हाई कोर्ट ने पीड़ा के उसके तर्क को सिरे से नकारते हुए कहा कि पत्नी अगर शादी के बाद होने वाले सेक्स के लिए इज़ाज़त दे, इसका ये मतलब बिलकुल नहीं है कि उसने गर्भधारण के लिए भी अपनी सहमति दी है. यह उसकी मर्जी पर निर्भर करता है कि वह बच्चे को जन्म दे या न दे. पति उसे इसके लिए मजबूर नहीं कर सकता. अगर आप बच्चा चाहते हैं तो ये पति-पत्नी दोनों की आपसी समझ पर निर्धारित होता है.

हाईकोर्ट के इस स्पष्ट रुख को और मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि मानसिक रूप से कमजोर महिला भी गर्भपात कराने का पूरा अधिकार रखती है. इसमें किसी तरह का कोई दखल नहीं किया जा सकता.

इस तरह का अहम फैसला आना न केवल इस रुढ़िवादी नजरिए में बदलाव की ज़रूरत को बताता है, अपितु कानून की दृष्टि से उसे पालन करने की सख्ती भी देता है.

समाज के उन्नत होने की तरफ यह एक बड़ा कदम है जिसका खुले दिल से अभिनन्दन किया जाना चाहिए. 



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