कुछ तस्वीरे सामने आई हैं भदोही में ट्रेन और स्कूल वैन हादसे की

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छोटे से लेकर बड़े स्कूलों तक में बच्चों को लाने ले जाने के लिए पैडल रिक्शा, ऑटो, बंद ऑटो, वैन आदि का प्रयोग होता है। अच्छी खासी फीस के बावजूद नामचीन स्कूल भी पता नहीं किस मजबूरी के मारे होते हैं कि जिस वाहन में 10 बच्चों का बैठना मुश्किल होता है उसमें 20 बच्चों को बैठा दिया जाता हैं, किसी भी प्रकार के स्कूली वाहन में क्षमता से दोगुने बच्चे ठूंस दिए जाते हैं। यहाँ तक ड्राइवर सीट के पास भी 2 से 5 बच्चे तक बैठाये जाते हैं। 

यह वही स्कूल वैन है, जिसमें हम अपने बच्चों को सुबह-सुबह अच्छे से तैयार करके, बैग में कोर्स की सारी किताबें टाइम टेबल के हिसाब से रखके अपने सामर्थ्य के हिसाब से बेहतरीन टिफिन पानी की बोतल रख के स्कूल इस उम्मीद से भेजते हैं कि बच्चे के बेहतर भविष्य में कम से कम पढ़ाई आड़े न आये। और यदि कभी ऐसी उम्मीदें किसी ट्रक के पहिये के नीचे, किसी बस की भिड़ंत में, किसी ट्रेन के चपेट में आकर बिखर जाएँ, तो ऐसी सूरत में आप क्या कर सकते हैं ? रोने-पीटने के अलावा आपके पास कुछ नहीं बचता, आपका फूल सा मासूम बच्चा हम बड़ों की लापरवाही का शिकार हो जाये तो कौन दोषी होगा ? 

बच्चे स्वभाव से चंचल होते हैं. वो कभी भी कुछ ऐसी हरकत कर सकतें हैं जिससे ड्राइवर का ध्यान भटक सकता है। इन सब लापरवाहियों और स्कूल को कम पैसों ज्यादा बच्चों को लाने ले जाने कि कुत्सित मानसिकता का विरोध हम अभिभावक कभी नहीं करते। न ही स्कूलों को नियंत्रित व उन पर नज़र रखने वाली सरकारी संस्थाओं से इससे कुछ तकलीफ है।

क्या हम खुद इस बात का विरोध कर सकते हैं ? अक्सर देखा जाता है कि स्कूल प्रशासन ऐसी आवाज़ें उठने पर कहते हैं कि आप अपना इंतज़ाम खुद देख लीजिये ! आप ही बताये, बड़ों की लापरवाही की भेंट मासूम बच्चे कब तक चढ़ते रहेंगे ?

आज सुबह उत्तर प्रदेश के भदोही जनपद में एक स्कूल वैन मानव रहित रेलवे क्रासिंग पर दुर्घटना ग्रस्त हो गयी जिसमे 7 बच्चों के मारे गए है। बताया जा रहा है वैन में बीस बच्चे थे। ऐसी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। आप खुद ही सोचिये लखनऊ के बड़े से बड़े स्कूल भी बच्चों को गाड़ियों में अमानवीय तरीके से ठूंसते हैं। क्या उन पर कभी नकेल कासी जा सकती है ? 
 



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