‘बनारस’ से लें सबक- राज कुमार गुप्ता

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जिस दिन कर्नाटक में विधानसभा चुनाव का परिणाम आया. उसी दिन प्रधानमंत्री के संसदीय स्थल में गिर गया निर्माणाधीन पुल का बीम. अब ये किसी की लापरवाही है, कई लोगों ने ज़िन्दगी का दामन छोड़ दिया. कई परिवार उजड़ गये. पर इस घटना ये साबित कर दिया जिस काम में जान का जोखिम हो, उसे भी करते समय सावधानी नहीं बरती जा रही है. किसी मामूली कोताही का नतीजा बड़े हादसे का कारण बन गया.

उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम के तहत निर्माणाधीन पुल जिस वक्त गिरा, उस समय उसके नीचे से दूसरे वाहन आम दिनों की तरह गुजर रहे थे. एकदम एक बड़े हिस्से के गिरने से लगभग एक दर्जन वाहन उसके नीचे दब गए और अठारह लोग मारे गए. जाहिर तौर पर इसे एक हादसा ही कहा जाएगा, पर|लेकिन} सवाल है कि पुल निर्माण कार्य के बीच जिस लेवल पर आपराधिक लापरवाही बरती गई है, क्या इस काम में लगे अधिकारियों को इतने लोगों की मौत का कारण नहीं समझना चाहिए 

घटना नहीं इसे गलती कहा जाएगा. इस गलती के बाद आनन-फानन में तुरंत चार अधकारियों को सस्पेंड कर उनपर मुकद्दमा दायर किया गया. जांच समिति गठित करके उसे 48 घंटे के अंदर रिपोर्ट देने को भी कहा. मगर ये सब घटना के बाद की गतिविधियां हैं. शहरों के प्रबंधन में आम तौर पर जो गड़बड़ियां होती हैं, उस तरफ सरकार का ध्यान जा पाया है या नहीं, कहना कठिन है. बनारस बहुत पुराना शहर है. किसी भी पारंपरिक शहर की तरह यहां संकरी गलियां और पतली सड़कें ही देखने को मिलती हैं. फ्लाईओवर और चौड़ी सड़कें इसकी पहचान का हिस्सा नहीं हैं. बढ़ती आबादी की नागरिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बनारस के इन्फ्रास्ट्रक्चर को विस्तार देना ही होगा.

लेकिन हैरानी की बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने सुरक्षा के लिहाज से निर्माण से संबंधित कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझा. इस तरह के किसी भी निर्माण के दौरान हर समय एक तरह के जोखिम की स्थिति बनी रहती है, लेकिन इस काम का निर्देशन और देखरेख कर रहे अधिकारियों की लापरवाहियों का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि न केवल व्यस्त समय में पुल के एक स्लैब को जोड़ने का काम जारी था, बल्कि उसके नीचे से वाहनों की आवाजाही पर कोई रोक भी नहीं थी और न ही सुरक्षा घेरे को लेकर सख्ती बरती गई. जबकि सेतु निगम की ओर से कहा गया है कि हमारे अधिकारियों ने यातायात का मार्ग बदलने के लिए प्रशासन को कई बार चिट्ठी लिखी थी. अगर यह सही है तो इस हादसे में सेतु निगम से लेकर प्रशासन से जुड़े सभी संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है. 

जाहिर है, अगर निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा संबंधी मामूली सावधानी बरती जाती तो पुल के एक हिस्से के ढहने के बावजूद इतनी बड़ी तादाद में लोगों की जान नहीं जाती. वाराणसी का यह हादसा इस तरह की अकेली घटना नहीं है. करीब दो साल पहले कोलकाता में एक निर्माणाधीन पुल के ढह जाने की ऐसी ही घटना हुई थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी. अमूमन इस तरह की हर घटना के बाद जांच के लिए समिति बना दी जाती है, लेकिन यह शायद ही कभी पता चलता है कि उसकी रिपोर्ट के आधार पर क्या कदम उठाए गए. जबकि किसी भी हादसे का सबसे बड़ा सबक यह होना चाहिए कि भविष्य में वे सारे इंतजाम किए जाएं, हर मोर्चे पर सावधानी बरती जाए, ताकि वैसी घटना दोबारा नहीं हो. मगर आमतौर पर देखा गया है कि जब तक कोई हादसा नहीं हो जाता, तब तक उससे बचने के इंतजामों पर बात शुरू नहीं होती. 

इस क्रम में गुणवत्ता और सुरक्षा के मानकों की कितनी अनदेखी हो रही है, शहर के आम लोगों को इसके चलते रोजाना कितनी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है, इन सवालों पर ज्यादा ठहरकर सोचने की जरूरत है. राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन इस हादसे से कुछ सबक ले सके तो यह बनारस के लिए सुकून की बात होगी. अबी भी ज़्यादा देर नहीं हुई है, जो हो गया उसे बदला तो नहीं जा सकता लेकिन उससे सबक लेकर आगे के लिए सतर्कता जरूर बरत सकते हैं. इस हादसे से सबक लेना बेहद जरुरी है. यह बात स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक को समझनी होगी.  



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