राहत के बावजूद प्रदूषण कम नहीं- राज महाजन

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दिवाली की शाम सात बजे के बाद हवा में घुले हानिकारक सूक्ष्म कण पीएम यानी पार्टिकुलेट मैटर 2.5 और 10 की मात्रा काफी बढ़ गई. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, हवा की गुणवत्ता का सूचकांक पिछले साल के 431 अंक के मुकाबले कम यानी 319 था. परन्तु इस मानक पर भी हवा की गुणवत्ता को बेहद खराब माना जाता है. इस बार दिल्लीवासी बच गए वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से. सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पर बम-पटाखों पर बैन लगाया था. लेकिन क्या सच में इस बार प्रदूषण नहीं था आसमान में? क्या सच में दिल्ली वासी के गले धुएं खाने से बच गये?

यदि बीते हुए कुछ सालों की बात की जाए, तो दिवाली के दौरान पटाखों की वजह से काफी भयंकर प्रदूषण बढ़ जाता है. इसी चलते इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने एनसीआर यानी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पटाखों की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी थी. नतीजतन, पटाखों का धुआं भी कम हुआ और पिछले साल की अपेक्षा में इस बार प्रदूषण के लेवल में भी काफी कमी आई है. सिर्फ इतना ही नहीं, सेहत के लिहाज से लोगों को काफी राहत मिली है. बावजूद इसके दिल्ली में प्रदूषण निगरानी केंद्रों पर हवा की जो गुणवत्ता दर्ज की गई, वह आश्चर्जनक रूप से बेहद खराब थी.

सरकार ने बिक्री-खरीद पर बैन तो लगा दिया था लेकिन दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद के गली-मुहल्लों में पटाखे खुलेआम बिके.  लोग जानते हैं कि पटाखों के धमाकों और धुएं की वजह से कैसे सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है, आंखों में जलन की वजह से कुछ भी देखना सहज नहीं रहता. इसके बावजूद पटाखे बेचने और खरीदने पर पाबंदी के अदालत के आदेश का आशय समझने की जरूरत नहीं समझी गई.  इस अनुभव को देखते हुए अगली बार से प्रशासन को सख्त होना पड़ेगा.

क्या प्रदूषण का कारण सिर्फ दिवाली ही है. दिवाली एक बार आती है. लेकिन प्रदूषण तो पूरे साल ही बढ़ता जाता है. इसके पीछे अनगिनत वाहनों का तेजी से धुआं फैलाना शामिल है. गाड़ियों से निकलने वाले धुंए के कारण ही हवा में जहरीले तत्वों में इजाफा हुआ है. दिवाली का सिर्फ इसमें छोंक बराबर हाथ है.

विचारणीय है सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली के वातावरण को साफ करने के मकसद से ही बम-पटाखों पर बैन लगाया था लेकिन कुछ लोग इसे धर्म और आस्था के चश्मे से देखने लगे हैं क्यूंकि हिंदुस्तान एक ऐसा देश बन गया है जहाँ हर मामले में धर्म को बिना वजह झोंक दिया है. ऐसा इसलिए होता है ताकि इसपर सियासत गरमाई जा सके. कुछ लोगों ने सर्वोच्च अदालत के आदेश के औचित्य पर सवाल उठाए और उसे नाहक धार्मिक चश्मे से देखने की कोशिश की. पर्यावरण की फिक्र वक्त का तकाजा है. पर्व की आड़ में प्रदूषण को बढ़ाने की इज़ाज़त नहीं दी जा सकती. सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी के हित में था ये अलग बात है बैन के बाद भी प्रदूषण स्तर उतना कम नहीं हुआ जितना सोचा था.

 



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