जैसी करनी वैसी भरनी - राज कुमार गुप्ता

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सत्तर के दशक में साबरमती तट के छोटे से आश्रम से निकलकर 19 देशों में 400 से अधिक आश्रमों, चार करोड़ से ज्यादा भक्तों और दस हजार करोड़ से भी ज्यादा संपत्ति का स्वामी बने आसाराम एक ऐसा नाम है, जो अध्यात्म की डगर पर सरपट दौड़ता रहा. उनके आगे नतमस्तक बडे़-बड़े राजनेता, उद्योगपति और सफ़ेद कपड़े वाले इस सरपट में उनकी राह आसान करते दिखे. वह एक ऐसे आभामंडल के मालिक थे कि जब अपने ही शिष्य की नाबालिग बच्ची से बलात्कार के मामले में गिरफ्तार हुए, तो भक्तों की असीम सेना यह सच मानने को तैयार नहीं थी. 2013 के मामले में फ़िलहाल उसे सजा तो मिल गयी तो उसने एक कैदी के रूप में कई रातें भी जेल में गुजारी हैं. निचली अदालत ने उसे ताउम्र कैद की सजा सुना दी है. हाल के दिनों में अदालतों की सख्ती ने इनके कुछ ढोंग खोले हैं. अदालत सख्त न होती, तो यह मामला भी कभी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच पाता. परन्तु मन के किसी कोने में उसे ऊपरी अदालत से राहत की एक आशा सी है. पांच साल बाद आये इस फैसले से देश की कानून-व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा है. यह बताता है कि अध्यात्म को गंदा धंधा बना देने वाले नकली बाबाओं के दिन अब लद चुके हैं. वह अराजकता का ऐसा उदाहरण बने कि उनके जेल जाने और मुकदमा शुरू होते ही तमाम और मामले तो खुले ही, मामलों के गवाहों पर जानलेवा हमले भी शुरू हो गए. उनके एक निजी सहायक और आश्रम के एक विश्वासपात्र रसोइए की हत्या भी कर दी गई. कई और हत्याएं हुईं. कई गवाह तो अब तक लापता हैं.

सच है कि जब सामने आंखें मूंदे भक्तों का विशाल और अथाह समुद्र हो, तो अपने सारे बुरे काम ढके हुए दिखते हैं. यही आसाराम के साथ भी हुआ. यह चार दशक की संतई के सफर में खडे़ हुए विशाल साम्राज्य के ढहने की कहानी भी है. उस संत की सत्ता ढहने की कहानी, जो अपने आचरण में इतना निरंकुश हो चुका था कि जिस वक्त पूरा देश निर्भया गैंगरेप जैसे जघन्य मामले पर आंदोलित था, उसके बयान ने उसके भक्तों को भी थोड़ी देर के लिए ही सही, विचलित कर दिया था.

बाबागीरी इस देश में इतना बड़ा धंधा है, जहां बिना किसी निवेश के भक्तों की फसल बोई जा सकती है और उसे बार-बार काटकर मालामाल हुआ जा सकता है. ऐसा धंधा, जहां बिना किसी प्रयास के बड़े-बड़े राजनेता और रईसों की फौज न सिर्फ अनुयाई बनी दिखती है, जाने-अनजाने ऐसे फर्जी चरित्र वालों की ढाल बनकर खड़ी हो जाती है. अब समाज को ऐसे फर्जी बाबाओं का मूल चरित्र समझकर इनसे तौबा करने की जरूरत है. अभी कुछ बाबा कानून की जद में आए हैं. कई अब भी अपने-अपने तरीके से जनता को बरगला रहे होंगे. यह फैसला उनके लिए भी संभल जाने का संदेश है. लेकिन आये दिन खुलने वाले इन प्रकरणों से एक बात जाहिर होती है कि हमारा समाज आज भी बाबाओं के चंगुल में है.



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