अभी भी बाकी सुधार की गुंजाईश – राज कुमार गुप्ता

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पंजाब नेशनल बैंक में अरबों रुपए का घोटाला सामने आने के बाद सरकार नींद से जाग गई है. ऐसे घोटालों को कैसे रोका और कर्ज डकार कर भागने वालों से निपटा जाए, यह सवाल सरकार और बैंक प्रबंधन के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है. फिलहाल शुरूआती दौर में सक्रिय हुए वित्त मंत्रालय ने सभी बैंकों को पंद्रह दिन की मोहलत देते हुए ऐसे जोखिमों से बचाव के लिए अपनी व्यवस्था दुरुस्त करने को कहा है. लगातार बैंकिंग घोटालों से परेशान सरकार ने बैंकों में सुधार के लिए कुछ कदम उठाए हैं. वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 50 करोड़ रुपये से अधिक के सारे एनपीए खातों की जांच करने और उनमें किसी तरह की गड़बड़ी मिलने पर इसकी जानकारी CBI को देने का आदेश दिया है. 

बड़े घोटालों से पार पाने के लिए सीबीआई के अलावा प्रवर्तन निदेशालय और राजस्व खुफिया निदेशालय जैसी एजंसियां भी सक्रिय भूमिका निभाएंगी. जो ताकतवर लोग कर्ज लेकर चंपत हो गए हैं, उनसे वसूली के लिए नया कानून बनाने की भी तैयारी है. इस कानून में आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली एजंसियों को और सशक्त बनाने का कानून है. यह कानून बनने के बाद ऐसे फरार घोटालेबाजों के खिलाफ मुकदमों के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएंगी, जो इन मामलों का निपटारा करेंगी.

शुरू में नीरव मोदी-मेहुल चोकसी का घोटाला ग्यारह हजार चार सौ करोड़ रुपए का था, परन्तु अब यह बारह हजार सात सौ करोड़ को पार कर गया है. रोटोमैक कंपनी का साढ़े तीन हजार करोड़का घोटाला और सिंभावली शुगर मिल में सौ करोड़ से ऊपर का घोटाला भी उजागर हुआ. अभी ऐसे और घोटाले सामने आएं तो कोई हैरानी की बात नहीं. 

असल में, ये घोटाले बैंकों के कुप्रबंधन और गहरे पैठे भ्रष्टाचार की देन हैं. बैंक अफसरों की मदद से कर्जखोर कैसे लूट मचाते हैं, पंजाब नेशनल बैंक घोटाला इसका उदाहरण है. पीएनबी का उप प्रबंधक गोकुलनाथ शेट्टी सात साल से जिस संवेदनशील पद पर जमा था, उस पर तीन साल से अधिक किसी को नहीं रखा जा सकता, जबकि तीन बार शेट्टी के तबादले के आदेश ख़ारिज हुए. जाहिर है, शेट्टी की पहुंच ऊपर तक रही होगी और शीर्ष स्तर पर भी इससे कोई अनजान नहीं रहा होगा. 

तमाम बैंकों को परिचालन और तकनीकी जोखिमों से निपटने के लिए 15 दिनों के भीतर एक पुख्ता व्यवस्था तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं. वित्तीय सेवा विभाग के सचिव राजीव कुमार ने कहा कि बैंकों के कार्यकारी निदेशकों और मुख्य तकनीकी अधिकारियों को जोखिम से निपटने के लिए अपनी तैयारियों को व्यवस्थित करने के मकसद से एक कार्य-योजना तैयार करने के लिए कहा गया है. उधर रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को 30 अप्रैल तक स्विफ्ट प्रणाली को कोर बैंकिंग प्रणाली के साथ जोड़ने का निर्देश दिया है. इससे लेन-देन को लेकर बैंकों की अंदरूनी निगरानी प्रक्रिया मजबूत होगी. देखना है, बैंकों के आला अधिकारी इस समस्या से निपटने के लिए अपनी तरफ से क्या कदम उठाते हैं. एक बात तो तय है कि सीबीआई या प्रवर्तन निदेशालय के बूते इस बीमारी का इलाज संभव नहीं. ये एजेंसियां बाकी मामलों में किस तरह से काम कर रही हैं, यह जगजाहिर है. समाधान ऐसा ढूंढना होगा कि जालसाजी की भनक शुरुआत में ही मिल सके और एनपीए का ढेर लगने से पहले उसे रोका जा सके. 



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