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काव्य-रचना में राज महाजन का अनूठा प्रयोग, राज्यमंत्री कवि सुनील जोगी की कविता ‘बेटियाँ’ का काव्य-विडियो मोक्ष म्युज़िक द्वारा रिलीज़

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“बेटियां भगवान का सबसे बड़ा वरदान हैं”, मोक्ष म्युज़िक की सबसे अदभुत प्रस्तुति जो समर्पित है बेटियों के लिए. जिसमें बेटियों के विभिन्न रूप को दर्शाया है. मार्मिकता भरी इस कविता को लिखा और प्रस्तुत किया है प्रसिद्ध साहित्यकार और उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री पद्मश्री डॉ सुनील जोगी ने और इसे मीठे संगीत से सजाकर कविता विडियो का निर्माण किया है मोक्ष म्युज़िक कंपनी के संगीतकार राज महाजन ने. हम सभी यह बात जानते हैं कि आज के युग में बेटियां किसी भी मायनों में बेटों से कमतर नहीं हैं. लेकिन यह बात जानते हुए भी हम हर जगह फर्क करते हैं. सिर्फ बोलने भर से ही बदलाव नहीं होते. बदलाव लाने के लिए बहुत से क़दम उठाने होते हैं. “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” आज एक अहम मुद्दा है जिसके लिए भारत सरकार भी प्रयासरत हैं और अपने-अपने तरीके से इस क्षेत्र में काम भी कर रही हैं. लेकिन बदलाव तभी संभव हो पायेगा जब हम व्यक्तिगत रूप से भी इस बदलाव को होंगे देंगे और इसके लिए कदम उठाएंगे.   
 
ऐसा ही एक व्यक्तिगत प्रयास किया है प्रसिद्ध संगीतकार राज महाजन ने और इस काम में उनका साथ निभाया पद्मश्री साहित्यकार डॉ सुनील जोगी ने. उन्होंने बेटियों पर हो रहे अत्याचार को मद्देनज़र रखते हुए, लोगों को बेटी के प्रति जागरूक करने के लिए एक कविता-वीडियो बनाई जिसका शीर्षक रखा गया “बेटियां – सबसे बड़ा वरदान”. इस कविता विडियो को बनाने के पीछे मकसद है समाज में फैली विकृत मानसिकता को खत्म करने का प्रयास करना. ताकि हमारी बहू, बेटियां सुरक्षित रहें. उनके बढ़ते कदम कभी रुकने न पायें. राज महाजन अपने नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं. बेटियां कविता के ज़रिये उन्होंने प्रोडक्शन के क्षेत्र में एक नया काम किया है. आपने म्युज़िक-विडियो तो बहुत देखे होंगे, लेकिन इस बार यह काव्य-विडियो अपने आप में ही काफी करिश्माई है. कविता की प्रस्तुति का यह नया अंदाज़ विडियो के रूप में राज महाजन कि परिकल्पना है. विडियो में शब्दों और उनके भावों का बखूबी प्रयोग किया गया है. डॉ जोगी की कलम से काफी चुनिन्दा शब्द निकले हैं, साथ ही शब्दों से संबंधित स्लाइड का प्रयोग किया गया है जिससे उन शब्दों का वजन कई गुना अधिक बढ़ गया है. जो वस्तुएं को हमारी आँखें देखती हैं वो हमारे मस्तिष्क पर गहरा असर डालती हैं और हमें याद भी रहती हैं. इसलिए यह कविता विडियो के रूप बनाई गई है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे देखकर अपनी सोच को बदल सके. सबसे ज़्यादा कमाल किया है शब्दों के पीछे चलने वाले संगीत ने. जिसे संगीतकार राज महाजन ने ख़ास इस कविता विडियो के लिए बनाया.

हाल ही में राज महाजन और डॉ सुनील जोगी एक साथ अपने फैन्स से फेसबुक लाइव के माध्यम से रूबरू हुए और इस काव्य-विडियो के बारे में बात की. इतने संवेदनशील मुद्दे को इतने बेहतरीन ढंग से दिखाना वाकई में काबिले तारीफ है. सूत्रों की माने, तो आगे बहुत जल्द राज महाजन और साहित्यकार सुनील जोगी मिलकर एक साथ फिर कुछ अलग ही करने जा रहे हैं. जी हाँ! अब जोगी जी सिंगर बनने जा रहें हैं और यह कारनामा भी राज महाजन ही करवा रहे हैं. बहुत जल्द सुनील और राज की जोड़ी एक ऐसा हास्य-गाना दर्शकों के लिए ला रही है जिसे लोग खूब मजे के साथ सुनेंगे और खुद की ज़िन्दगी से जोड़ कर भी देखेंगे. हो सकता है भविष्य में आप कवि सुनील जोगी और संगीतकार राज महाजन को मंच साझा करते हुए देख पाएं. राज महाजन ने कहा, “एक संगीतकार होने के नाते मैं तरह-तरह के प्रयोग करता रहता हूँ. मैं हिंदी भाषा के उत्थान को लेकर काम करना चाहता था. जिसके लिए मैं कुछ नया करना चाहता था. इसी दौरान मेरी मुलाक़ात जोगी जी से हुई और जब हम दोनों साथ बैठे तो निकल आया कविता विडियो ‘बेटियां’. पारंपरिक काव्य-कला को काव्य-विडियो के नए रूप में बनाकर मैंने यह प्रयोग किया है. और मुझे कई कवियों कि तरफ स इस नए प्रयोग के लिए शुभकामनायें मिल रही हैं. मेरा मानना है कि हमें काम में हमेशा नयापन लाना चहिये ताकि काम में ताजगी बनी रहे.”  

वहीं सुनील जोगी ने कहा, “बेटी के प्रति मेरी पहले से ही विशेष सहानुभूति रही है. जब मैंने बेटी पर एक कविता राज भाई को सुनाई तो इन्होंने कहा क्यों न इस पर एक वीडियो बनाई जाए. मैंने एक कविता लिखी और इन्होंने उसपर विडियो बना दिया जो आप सबके सामने है जिसे आप दर्शक खूब प्यार दे रहे हैं. मुझे लगता है इस प्रयोग से काव्य-रचना कला को एक नया आयाम मिलेगा”

राज महाजन ने बताया, “कई जगह बेटी वाले खुद को छोटा समझते हैं, जबकि बेटे वालों को बड़ा समझा जाता है. लेकिन ऐसा समझा जाना बेहद गलत है. आज बेटी किसी भी तरह से बेटों से कम नहीं है. वह हर क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है. मेरी खुद की भी एक बेटी है और मुझे गर्व होता है कि मेरे घर में एक बेटी ने जन्म लिया है. हमने कोशिश की है कि वीडियो के जरिए हम समाज की ऐसी ही कुरीतियों और बुराइयों को कम कर सकें.” सुनील जोगी ने कहा, “बेटियों पर आज कई तरह के अत्याचार हो रहे हैं. रेप और घेरेलु हिंसा जैसी घटनाएं आम होती जा रहीं हैं. हम चाहते हैं कि इस वीडियो से समाज के लोगों की विकृत मानसिकता बदले. हम दोनों का उद्देश्य लोगो को यह समझाना है कि बेटियां बोझ नहीं बल्कि बोझ उतारती हैं.”

राज महाजन में कहा, “मेरी खुद एक बेटी है तो इस वीडियो में मेरा पर्सनल अटैचमेंट आ गया. आपने इस वीडियो को देखा होगा तो जोगी जी के पीछे बैकग्राउंड में कुछ तस्वीरें चल रही हैं. उन्हीं तस्वीरों में मेरी बेटी सौम्या और जोगी जी की बेटी शिवोना की तस्वीरें भी नज़र आएँगी. यहाँ मैं यह भी कहना चाहूँगा कि अगर इस वीडियो के किसी भी हिस्से का सन्देश लोगों के दिल में उतर जाए तो हम इसे अपनी कामयाबी समझेंगे. हम समझेंगे हमारा प्रयास सफल हुआ.” सुनील जोगी बताते हैं, “कविता को इस तरह से प्रस्तुत करना मेरे लिए बेहद रोमांचकारी था. मैंने यह कविता बेटियों को समर्पित की है. मेरी कविता से किसी भी व्यक्ति के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो मैं इसे कविता की कामयाबी समझूंगा.”

सुनील जोगी के साथ अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में राज ने कहा, “हम दोनों की मुलाकात एक टीवी शो के दौरान हुई. आपको बता दूं मेरा एक टीवी शो आया करता था ‘म्युज़िक मस्ती विद राज महाजन’. इसमें चर्चित चेहरों से उनकी ज़िन्दगी से जुड़े सभी पहलुओं पर बातचीत होती थी वो भी म्युज़िक के अंदाज़ में. बस वहीं से हम दोनों की मुलाक़ात हुई और दोस्ती का सिलसिला चल पड़ा जो आज इस कविता विडियो के ज़रिये आपके सामने है.” वहीँ साहित्यकार सुनील जोगी ने बताया, “मैं एक गेस्ट के रूप में राज भाई के टीवी शो पर आया था. शो में सवाल-जवाब के बीच में ही ऐसा लगने लगा था मानो हमारी जान-पहचान बहुत पुरानी है. आज हम दोनों साथ में है और कोशिश कर रहे हैं अपने-अपने काम के ज़रिये लोगों तक अच्छे सन्देश फैला सकें.”

आपको बता दें कि राज महाजन संगीत की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम है. जिन्होंने कई कठिनाइयों के बाद इस मुकाम को हासिल किया है. एक अच्छे इंसान होने के साथ-साथ राज एक कमाल के कलाकार भी हैं. बचपन से ही संगीत को पूजने वाले राज आज इस मुकाम पर हैं जहाँ से वह आने वाले कल को एक मंच दे रहे हैं. अपनी कम्पनी “मोक्ष म्युज़िक” के ज़रिये राज कलाकारों को ऐसा मंच देते हैं जिसपर चलकर आज का कलाकर आने वाले कल का सिकंदर बने, खुद को पहचान सके और निखार सके. न्यू कमर्स के लिए गॉडफादर बन चुके राज में सभी गुण मौजूद हैं जो उन्हें एक कामयाब इंसान बनाते हैं. वहीँ राज के दोस्त कवि सुनील जोगी भी किसी से कम नहीं. साहित्य की दुनिया का एक जाना-माना चेहरा हैं. सुनील जोगी कमाल के साहित्यकार हैं जिनकी छाप अक्सर कवि सम्मेलनों में देखने को मिलती है. साथ ही वह मौजूदा उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री भी हैं और हिंदुस्तान अकादमी में चेयरमैन हैं. साहित्य में अनुपम योगदान के लिए उन्हें पिछले ही वर्ष पद्मश्री से नवाजा जा चुका है. अभी हाल ही में सुनील जोगी को उत्तर प्रदेश सरकार से यश भारती का खिताब भी मिला है. 

इस तरह के कार्यों से ही बेहतर कल का निर्माण हो सकता है. सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का एहसास अगर होगा तो समाज में फैली कुरीतियाँ एक दिन खत्म ज़रूर होंगी. इस कविता का ऑडियो और विडियो on itunes, saavn, gaana, soundcloud, spotify, deezer, mobile tunes, hungama और 250 से ज्यादा म्युज़िक और विडियो websites पर पुरे विश्व में  उपलब्ध है. देखिये विडियो. 
 

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  • होली उन्माद, गरिमा और मर्यादा से भरा पर्व है, पहचाने इसकी सार्थकता

    सारा...रा...रा...रा...जोगी जी, सारा...रा...रा...रा...फागुन मास की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मनाये जाने वाला होली का यह पावन त्यौहार सर्दी के अन्त और ग्रीष्म के प्रारम्भ के सन्धिकाल में तथा वसंत ऋतु की श्रीवृद्धि समृद्धि के मादक वातावरण में अपनी उपस्थिति देता है. फाल्गुन की पूर्णमासी को होने के कारण इसे फाग भी कहते हैं.

    पूर्णमासी से एक दिन पहले रात को लोग होली जलाते हैं और उसमें गेहूं की बालें तथा चने के छोले भुनते हैं. रंगों और संगीत का उन्माद लोगों को उत्साह और उमंग से भर देता है. वासंती पवन के साथ फागुनी रंगों की बौछार लिये होली का यह त्योहार प्रेम, हर्ष, उल्लास, हास्य विनोद, समानता चेतनता, जागति का पर्व है. यद्यपि इस पर्व के मनाये जाने के पीछे कुछ पौराणिक कथाएं हैं, तथापि इसे मनाये जाने के सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं. इस पर्व की सबसे ख़ास बात है कि यह मौसम और रंगों के अनुकूल होता है.

    होली के साथ एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है. एक राजा हिरण्यकष्यप था. जो चाहता था सभी उसे भगवान मानकर उसकी पूजा करें. उनका पुत्र प्रह्लाद उन्हें ईश्वर नहीं मानता था. बहुत समझाने पर भी वह नहीं समझा तो उन्होंने उसे मारने के कई उपाय किये, पर वह नहीं मरा. हिरण्यकष्यप की बहन होलिका को आग में न जलने का वर मिला हुआ था. होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गयी. ईश्वर की कृपा से होलिका जल गयी और प्रह्लाद सकुशल बच गया. इसी की याद में होली जलायी जाती है.

    इस पर्व को सम्पन्नता के लिहाज से भी बड़ा माना गया है. होली के अवसर पर किसानों की फसल पक जाती है. अतः लहलहाती फसलें देखकर किसान खुशी से झूम उठते हैं और आग में अनाज की बालों को भूनकर खाते एवं खिलाते हैं.

    अगले दिन सुबह अर्थात दुलहंडी के दिन होली खेली जाती है. सब लोग वैर-विरोध भूल कर एक दूसरे के गले मिलते हैं, मिठाइयां खाते और खिलाते हैं तथा प्यार के रंगों में रंग जाते हैं. सभी एक दूसरे पर रंग डालते और गुलाल मलते हैं. गुंजिया और तरह-तरह की मिठाइयों से वातावरण में मिठास घुल जाती है. इसलिए कहते हैं ‘बुरा न मानो...होली है’.

    होली की सार्थकता तब तक नहीं हो सकती जब तक इसमें भगवान श्रीकृष्ण की ब्रज की होली की बात न हो. ब्रज की होली तो सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में प्रसिद्ध है. वहाँ मनाई जाने वाली होली बेहद ख़ास होती है क्यूंकि स्वयं प्रभु इस उत्सव को बड़े ही चाव से मानते थे और कहा जाता है आज भी श्रीकृष्ण इस पर्व को मानने आते हैं.

    आज के परिपेक्ष्य में देखा जाए तो सभी वस्तुओं में मिलावट हो गयी है. आजकल अच्छे रंगों का प्रयोग न करके रासायनिक लेपनों, नशे आदि का प्रयोग करके इसकी गरिमा को समाप्त कर रहे हैं. आज के व्यस्त जीवन के लिए होली चुनौती है. इसे मंगलमय रूप देकर मनाया जाना चाहिए. तभी इसका भरपूर आनंद लिया जा सकेगा. इसके विपरीत पहले टेसू के रंगों का इस्तेमाल किया जाता था. कहते हैं टेसू के  प्रभाव से चेचक माता जैसी बीमारियों का शमन भी किया जाता है.

    होली का पर्व मनाये जाने के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व में से यह प्रमुख है कि होली समानता, सदभाव में वृद्धि करने, शत्रुता को मित्रता में बदलने का पर्व है. इस दिन छोटे-बड़े सभी अपनी सामाजिक पद-प्रतिष्ठा भूलकर मनोमालिन्य दूर करते हैं. अपने विरोधी भावों को छोड़ स्नेही भाव तरंगों में सराबोर हो हास्य-विनोद करते हैं, फगुवा गाते हैं .

    होली के इस पवित्र त्यौहार में समय परिवर्तन के साथ-साथ कुछ विकृतियों का प्रवेश हो गया है, जिसके फलस्वरूप ऐसा भी प्रतीत होता है कि कहीं हम इसके मूल स्वरूप को विस्मृत न कर जायें. होली के दिन स्वाभाविक सहज हास्य-विनोद के स्थान पर कुरुचिपूर्ण अश्लील, भद्दे, पतनकारी मनोभावों का प्रयोग होने लगा है. किसी सभ्य सुसंस्कृत समाज के लिए इसे छेड़छाड़ का रूप देना उचित नहीं है .

    कई अवसरों पर अपने से सम्मानीय स्त्रियों के प्रति अमर्यादापूर्ण आचरण करते हुए इसकी गरिमा, महता को यदूल जाते हैं. होलिका को गाली देने का आशय कुछ दूसरे अर्थो में लेने लगे हैं. कुछ तो होली के अवसर पर अपनी बुराइयों को पवित्र अग्नि में होम करने की बजाये प्रतिशोध की भावनाओं में जलकर अमानवीय कृत्य करते हैं. मदिरा और भांग का आवश्यकता से अधिक सेवन असन्तुलित बना देता है.

    यदि हम इन दोषों से दूर रहकर होली के वास्तविक परम्परागत स्वरूप को कायम रखते हैं, तो इस त्योहार की जो महिमा है, गरिमा है, वह बनी रहेगी; क्योंकि होली तो जीवन को उल्लासमय, उज्जल बनाने का पर्व है.

    यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारे देश ने त्योहारों की माला पहन रखी है. शायद कोई ऐसी महत्त्वपूर्ण अतिथि हो, जो किसी न किसी त्योहार, पर्व से सम्बन्धित न हो. छोटे-बड़े त्योहारों को लेकर चर्चा की जाए, तो हमारी सभी तिथियां किसी-न-किसी घटना का ही प्रतीक और स्मृति हैं. 

    यदि हम अपने पर्वों का सही मूल्यांकन करके उनकी गरिमा को बनाये रखेंगे तो उन्माद और हर्ष हमेशा बना रहेगा. 

  • अगर सुनार के धोखे से बचना है तो जाने क्या होती है 'एक्साइज ड्यूटी' (ED) ?

    मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने 10 ग्राम प्योर सोना 30000 रुपये का खरीदा. उस सोने को लेकर आप सुनार के पास हार बनवाने गए. सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनवाई लगेगी. आपने खुशी से कहा ठीक है. उसके बाद सुनार ने 1 ग्राम सोना निकाल लिया और 1 ग्राम का टांका लगा दिया. बिना टांके के आपका हार बन ही नहीं सकता ये तो सभी जानते हैं. 

    यानी अगर 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया और 2000 रुपये आपसे बनवाई अलग से लेली. तो सीधा-सीधा आपको 5000 रुपये का झटका लग गया. अब आपके 30 हजार रुपये सोने की कीमत मात्र 25 हजार रुपये बची और सोना भी 1 ग्राम कम होकर 9 ग्राम शेष बचा.  

    बात यहीं खत्म नहीं हुई. उसके बाद अगर आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या उसी सोने से कोई और आभूषण बनवाने पुन: उसी सुनार के पास जाते हैं तो वह पहले टांका काटने की बात करता है और सफाई करने के नाम पर 0.5 ग्राम सोना और कम हो जाता है

    अब आपके पास मात्र 8.5 ग्राम सोना ही बचता है. यानी कि 30 हजार का सोना अब बस 23500 रुपये का बचा.

    आप जानते होंगे कि,

    30000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनवाई = 32000 रुपये.

    1 ग्राम का टांका कटा 3000 रुपए + 0.5 ग्राम पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा मतलब सफाई के नाम पर = 1500 रुपये.

    शेष बचा सोना 8.5 ग्राम

    यानी कीमत 32000 - 6500 का घाटा = 25500 रुपये.

    यह वो था जो अब तक होता आया है. लेकिन इसके विपरीत भारत सरकार की मंशा क्या है? एक नज़र डालते हैं इस पर भी.

    एक्साइज ड्यूटी लगने पर सुनार को रसीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा. इतना ही नहीं जितने ग्राम का टांका लगेगा उसका सोने के तोल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

    जैसा कि आपके सोने का तोल 10 ग्राम है और टांका 1 ग्राम का लगा, तो सुनार को रसीद के आधार पर 11 ग्राम वजन करके उपभोक्ता को देना होगा. इससे उपभोक्ता को फायेदा होगा और सुनार अब तक जो प्रपंच करते आयें हैं उस पर लगाम लग सकेगी. इसीलिए सुनार हड़ताल पर है कि अब उनका धोखाधड़ी का भेद खुल जायेगा.
     

  • स्वयं के उत्थान के लिए भाषा का विकास सबसे ज़रूरी : राज महाजन

    कहते हैं जिसने अपनी मातृभाषा में पकड़ मजबूत करली वही इंसान जीवन में सफल है और मातृभाषा के उत्थान के लिए हमें ही कदम उठाने पड़ेंगे. 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. हिंदी को राजभाषा का दर्जा हासिल है और हिंदी भारत में बोलचाल के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया था. हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. 

    1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हिंदी को जनमानस की भाषा बताया था. साल 1949 में स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जिसे भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में बताया गया है कि ‘संघ की राज-भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था. इसी वजह से इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया. लेकिन जब राजभाषा के रूप में हिंदी लागू की गई तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोगों के बीच से विरोध के सुर भी उठने लगे और फिर अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा. यही कारण रहा है कि हिन्दी में भी अंग्रेजी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा.

    आज पूरा विश्व ग्लोबल हो गया है. इस दौर में भाषा ने भी अपना रूप बदल लिया है. हिंदी की जगह अंग्रेजी हो गया है. मज़े की बात है जिसे हिंदी नहीं बोलनी आती उसे भी अच्छी नौकरी मिलती है क्यूंकि उसे अंग्रेजी बोलनी आती है. हिंदी आये या न आये, लेकिन “इंग्लिश” आनी ज़रूरी है. अपनी ही भाषा का अपने ही देश में इस तरह से ह्रास होना निंदनीय है.

    1991 के बाद भारत में नव-उदारीकरण की आर्थिक नीतियां लागू की गई. नई प्रौद्योगिकी और इससे उपजते हुये सेवा और उद्योग देश की अर्थ, नीति में कई सारे महत्वपूर्ण बदलाव हुए. इस बदलाव का भाषा पर भी जबरदस्त असर पड़ा. अंग्रेजी के अलावा किसी दूसरे भाषा की पढ़ाई को समय की बर्बादी समझा जाने लगा. जब हिन्दी भाषी घरों में बच्चे हिन्दी बोलने से कतराने लगे, या अशुद्ध बोलने लगे तब कुछ विवेकी अभिभावकों के समुदाय को एहसास होने लगा कि घर-परिवार में नई पीढ़ियों की जुबान से मातृभाषा उजड़ने लगी है. इसलिए हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए राजभाषा सप्ताह या हिंदी पखवाड़ा मनाया जाने लगा. इस पूरे सप्ताह सरकारी विभागों और विद्यालयों में अलग-अलग प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है ताकि हिंदी को बढ़ावा दिया जा सके और ज़्यादा लोग इसका प्रयोग उतने ही स्वाभिमान से करे जैसे इंग्लिश का करते हैं. 

    आज सभी जगहों पर इंग्लिश के साथ-साथ हिंदी का चलन भी बढ़ा है. लेकिन नई पीढ़ी कहीं इससे पूरी तरह से वंचित न रह जाए इसलिए समाज का बुद्धिजीवी वर्ग इसके लिए प्रयास कर रहा है. हर तबका अपने-अपने हिसाब से हिंदी का उत्थान करने का प्रयास कर रहा है. कवि अपनी कविताओं के ज़रिये, साहित्यकार अपने साहित्य के ज़रिये, शिक्षक अपनी विद्या के ज़रिये और घर में माता-पिता अपने संस्कारों के ज़रिये. ऐसा ही एक छोटा सा प्रयास मैंने भी किया है और आगे भी करता रहूँगा. मैं राज महाजन अपने तरीके से हिंदी के उत्थान में जुड़ा हूँ. हो सकता है मेरा करना काफी नहीं होगा. लेकिन मैंने अपने ही बूते पर एक शुरुआत की है जिससे मैं आने वाली पीढ़ी को हिंदी का महत्व समझा सकूँ. मेरा मानना है अगर समाज को उन्नत और उत्कृष्ट बनाना है तो पहले अपनी जड़ों को मजबूत और संमृद्ध बनाना होगा. इसके लिए भाषा को पतन से बचाना होगा. ज़रूरी नहीं कि उत्थान तभी होगा जब हम रोज हिंदी बोलेंगे. उत्थान तब होगा जब हिंदी बोलने पर शर्म महसूस नहीं करेंगे. पूरी आत्मीयता से हिंदी को अपनाएंगे, हिंदुत्व का विकास हिंदी से ही होगा. आज हिंदी दिवस पर मैं सभी को इस ओर प्रेरित करता हूँ और आने वाली पीढ़ी से एक 
    गुज़ारिश करता हूँ कि अंग्रेजी का प्रयोग तो करें लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें जिनमें  हिन्द और हिंदी समाई है. हिंदी से जुड़ना मेरे लिए गौरव का विषय है.