ताज़ा खबर

 

काव्य-रचना में राज महाजन का अनूठा प्रयोग, राज्यमंत्री कवि सुनील जोगी की कविता ‘बेटियाँ’ का काव्य-विडियो मोक्ष म्युज़िक द्वारा रिलीज़

“बेटियां भगवान का सबसे बड़ा वरदान हैं”, मोक्ष म्युज़िक की सबसे अदभुत प्रस्तुति जो समर्पित है बेटियों के लिए. जिसमें बेटियों के विभिन्न रूप को दर्शाया है. मार्मिकता भरी इस कविता को लिखा और प्रस्तुत किया है प्रसिद्ध साहित्यकार और उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री पद्मश्री डॉ सुनील जोगी ने और इसे मीठे संगीत से सजाकर कविता विडियो का निर्माण किया है मोक्ष म्युज़िक कंपनी के संगीतकार राज महाजन ने. हम सभी यह बात जानते हैं कि आज के युग में बेटियां किसी भी मायनों में बेटों से कमतर नहीं हैं. लेकिन यह बात जानते हुए भी हम हर जगह फर्क करते हैं. सिर्फ बोलने भर से ही बदलाव नहीं होते. बदलाव लाने के लिए बहुत से क़दम उठाने होते हैं. “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” आज एक अहम मुद्दा है जिसके लिए भारत सरकार भी प्रयासरत हैं और अपने-अपने तरीके से इस क्षेत्र में काम भी कर रही हैं. लेकिन बदलाव तभी संभव हो पायेगा जब हम व्यक्तिगत रूप से भी इस बदलाव को होंगे देंगे और इसके लिए कदम उठाएंगे.   
 
ऐसा ही एक व्यक्तिगत प्रयास किया है प्रसिद्ध संगीतकार राज महाजन ने और इस काम में उनका साथ निभाया पद्मश्री साहित्यकार डॉ सुनील जोगी ने. उन्होंने बेटियों पर हो रहे अत्याचार को मद्देनज़र रखते हुए, लोगों को बेटी के प्रति जागरूक करने के लिए एक कविता-वीडियो बनाई जिसका शीर्षक रखा गया “बेटियां – सबसे बड़ा वरदान”. इस कविता विडियो को बनाने के पीछे मकसद है समाज में फैली विकृत मानसिकता को खत्म करने का प्रयास करना. ताकि हमारी बहू, बेटियां सुरक्षित रहें. उनके बढ़ते कदम कभी रुकने न पायें. राज महाजन अपने नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं. बेटियां कविता के ज़रिये उन्होंने प्रोडक्शन के क्षेत्र में एक नया काम किया है. आपने म्युज़िक-विडियो तो बहुत देखे होंगे, लेकिन इस बार यह काव्य-विडियो अपने आप में ही काफी करिश्माई है. कविता की प्रस्तुति का यह नया अंदाज़ विडियो के रूप में राज महाजन कि परिकल्पना है. विडियो में शब्दों और उनके भावों का बखूबी प्रयोग किया गया है. डॉ जोगी की कलम से काफी चुनिन्दा शब्द निकले हैं, साथ ही शब्दों से संबंधित स्लाइड का प्रयोग किया गया है जिससे उन शब्दों का वजन कई गुना अधिक बढ़ गया है. जो वस्तुएं को हमारी आँखें देखती हैं वो हमारे मस्तिष्क पर गहरा असर डालती हैं और हमें याद भी रहती हैं. इसलिए यह कविता विडियो के रूप बनाई गई है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे देखकर अपनी सोच को बदल सके. सबसे ज़्यादा कमाल किया है शब्दों के पीछे चलने वाले संगीत ने. जिसे संगीतकार राज महाजन ने ख़ास इस कविता विडियो के लिए बनाया.


हाल ही में राज महाजन और डॉ सुनील जोगी एक साथ अपने फैन्स से फेसबुक लाइव के माध्यम से रूबरू हुए और इस काव्य-विडियो के बारे में बात की. इतने संवेदनशील मुद्दे को इतने बेहतरीन ढंग से दिखाना वाकई में काबिले तारीफ है. सूत्रों की माने, तो आगे बहुत जल्द राज महाजन और साहित्यकार सुनील जोगी मिलकर एक साथ फिर कुछ अलग ही करने जा रहे हैं. जी हाँ! अब जोगी जी सिंगर बनने जा रहें हैं और यह कारनामा भी राज महाजन ही करवा रहे हैं. बहुत जल्द सुनील और राज की जोड़ी एक ऐसा हास्य-गाना दर्शकों के लिए ला रही है जिसे लोग खूब मजे के साथ सुनेंगे और खुद की ज़िन्दगी से जोड़ कर भी देखेंगे. हो सकता है भविष्य में आप कवि सुनील जोगी और संगीतकार राज महाजन को मंच साझा करते हुए देख पाएं. राज महाजन ने कहा, “एक संगीतकार होने के नाते मैं तरह-तरह के प्रयोग करता रहता हूँ. मैं हिंदी भाषा के उत्थान को लेकर काम करना चाहता था. जिसके लिए मैं कुछ नया करना चाहता था. इसी दौरान मेरी मुलाक़ात जोगी जी से हुई और जब हम दोनों साथ बैठे तो निकल आया कविता विडियो ‘बेटियां’. पारंपरिक काव्य-कला को काव्य-विडियो के नए रूप में बनाकर मैंने यह प्रयोग किया है. और मुझे कई कवियों कि तरफ स इस नए प्रयोग के लिए शुभकामनायें मिल रही हैं. मेरा मानना है कि हमें काम में हमेशा नयापन लाना चहिये ताकि काम में ताजगी बनी रहे.”  

वहीं सुनील जोगी ने कहा, “बेटी के प्रति मेरी पहले से ही विशेष सहानुभूति रही है. जब मैंने बेटी पर एक कविता राज भाई को सुनाई तो इन्होंने कहा क्यों न इस पर एक वीडियो बनाई जाए. मैंने एक कविता लिखी और इन्होंने उसपर विडियो बना दिया जो आप सबके सामने है जिसे आप दर्शक खूब प्यार दे रहे हैं. मुझे लगता है इस प्रयोग से काव्य-रचना कला को एक नया आयाम मिलेगा”

राज महाजन ने बताया, “कई जगह बेटी वाले खुद को छोटा समझते हैं, जबकि बेटे वालों को बड़ा समझा जाता है. लेकिन ऐसा समझा जाना बेहद गलत है. आज बेटी किसी भी तरह से बेटों से कम नहीं है. वह हर क्षेत्र में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है. मेरी खुद की भी एक बेटी है और मुझे गर्व होता है कि मेरे घर में एक बेटी ने जन्म लिया है. हमने कोशिश की है कि वीडियो के जरिए हम समाज की ऐसी ही कुरीतियों और बुराइयों को कम कर सकें.” सुनील जोगी ने कहा, “बेटियों पर आज कई तरह के अत्याचार हो रहे हैं. रेप और घेरेलु हिंसा जैसी घटनाएं आम होती जा रहीं हैं. हम चाहते हैं कि इस वीडियो से समाज के लोगों की विकृत मानसिकता बदले. हम दोनों का उद्देश्य लोगो को यह समझाना है कि बेटियां बोझ नहीं बल्कि बोझ उतारती हैं.”

राज महाजन में कहा, “मेरी खुद एक बेटी है तो इस वीडियो में मेरा पर्सनल अटैचमेंट आ गया. आपने इस वीडियो को देखा होगा तो जोगी जी के पीछे बैकग्राउंड में कुछ तस्वीरें चल रही हैं. उन्हीं तस्वीरों में मेरी बेटी सौम्या और जोगी जी की बेटी शिवोना की तस्वीरें भी नज़र आएँगी. यहाँ मैं यह भी कहना चाहूँगा कि अगर इस वीडियो के किसी भी हिस्से का सन्देश लोगों के दिल में उतर जाए तो हम इसे अपनी कामयाबी समझेंगे. हम समझेंगे हमारा प्रयास सफल हुआ.” सुनील जोगी बताते हैं, “कविता को इस तरह से प्रस्तुत करना मेरे लिए बेहद रोमांचकारी था. मैंने यह कविता बेटियों को समर्पित की है. मेरी कविता से किसी भी व्यक्ति के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो मैं इसे कविता की कामयाबी समझूंगा.”

सुनील जोगी के साथ अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में राज ने कहा, “हम दोनों की मुलाकात एक टीवी शो के दौरान हुई. आपको बता दूं मेरा एक टीवी शो आया करता था ‘म्युज़िक मस्ती विद राज महाजन’. इसमें चर्चित चेहरों से उनकी ज़िन्दगी से जुड़े सभी पहलुओं पर बातचीत होती थी वो भी म्युज़िक के अंदाज़ में. बस वहीं से हम दोनों की मुलाक़ात हुई और दोस्ती का सिलसिला चल पड़ा जो आज इस कविता विडियो के ज़रिये आपके सामने है.” वहीँ साहित्यकार सुनील जोगी ने बताया, “मैं एक गेस्ट के रूप में राज भाई के टीवी शो पर आया था. शो में सवाल-जवाब के बीच में ही ऐसा लगने लगा था मानो हमारी जान-पहचान बहुत पुरानी है. आज हम दोनों साथ में है और कोशिश कर रहे हैं अपने-अपने काम के ज़रिये लोगों तक अच्छे सन्देश फैला सकें.”

आपको बता दें कि राज महाजन संगीत की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम है. जिन्होंने कई कठिनाइयों के बाद इस मुकाम को हासिल किया है. एक अच्छे इंसान होने के साथ-साथ राज एक कमाल के कलाकार भी हैं. बचपन से ही संगीत को पूजने वाले राज आज इस मुकाम पर हैं जहाँ से वह आने वाले कल को एक मंच दे रहे हैं. अपनी कम्पनी “मोक्ष म्युज़िक” के ज़रिये राज कलाकारों को ऐसा मंच देते हैं जिसपर चलकर आज का कलाकर आने वाले कल का सिकंदर बने, खुद को पहचान सके और निखार सके. न्यू कमर्स के लिए गॉडफादर बन चुके राज में सभी गुण मौजूद हैं जो उन्हें एक कामयाब इंसान बनाते हैं. वहीँ राज के दोस्त कवि सुनील जोगी भी किसी से कम नहीं. साहित्य की दुनिया का एक जाना-माना चेहरा हैं. सुनील जोगी कमाल के साहित्यकार हैं जिनकी छाप अक्सर कवि सम्मेलनों में देखने को मिलती है. साथ ही वह मौजूदा उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री भी हैं और हिंदुस्तान अकादमी में चेयरमैन हैं. साहित्य में अनुपम योगदान के लिए उन्हें पिछले ही वर्ष पद्मश्री से नवाजा जा चुका है. अभी हाल ही में सुनील जोगी को उत्तर प्रदेश सरकार से यश भारती का खिताब भी मिला है. 

इस तरह के कार्यों से ही बेहतर कल का निर्माण हो सकता है. सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का एहसास अगर होगा तो समाज में फैली कुरीतियाँ एक दिन खत्म ज़रूर होंगी. इस कविता का ऑडियो और विडियो on itunes, saavn, gaana, soundcloud, spotify, deezer, mobile tunes, hungama और 250 से ज्यादा म्युज़िक और विडियो websites पर पुरे विश्व में  उपलब्ध है. देखिये विडियो. 
 

ज़रूर पढ़ें


loading...
  • ‘स्कूल’ हैं सबसे ज़्यादा असुरक्षित – राज महाजन

    ‘स्कूल’ हैं सबसे ज़्यादा असुरक्षित – राज महाजन

    8 सितम्बर को हुआ इंसानियत को शर्मशार करने वाला  काण्ड. एक बच्चा रोज की तरह अपने स्कूल जाता है. लेकिन उस दिन वह घर वापिस नहीं आता. अपने पीछे छोड़ गया वो खिलखिलाती सी मुस्कान, मीठी बातें और कई ‘अनसुलझे सवाल’. गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाले प्रद्युम्न का मर्डर क्या सच में बस कंडक्टर अशोक ने किया है? कैसे कंडक्टर स्कूल में चाकू लेकर दाखिल हो जाता है? क्यूँ उसने प्रद्युम्न को ही अपना शिकार बनाया? क्या प्रद्युम्न ने स्कूल में कुछ ऐसा देखा था कि जिसकी वजह से उसे मौत के घाट उतार दिया गया?

    सिर्फ एक प्रद्युम्न के साथ ही ऐसा नहीं हुआ है. पिछले कुछ दिनों में यह फेहरिस्त काफी लम्बी हो गयी है. बेंगलुरु में भी स्कूल के ही चपरासी ने चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया. घटना का ख़ुलासा तब हुआ जब बच्ची ने प्राइवेट पार्ट में दर्द की शिकायत घरवालों से की. ऐसी ही एक घिनौनी हरकत देखने को मिली दिल्ली के गांधीनगर के पब्लिक स्कूल में. टैगोर पब्लिक स्कूल के गार्ड ने पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया. गार्ड ने क्लासरूम में ले जाकर बच्ची को पहले मारने की धमकी दी और फिर उससे दुष्कर्म किया. इसके अलावा नई दिल्ली के वसंतकुंज में छह साल के एक बच्चे की वाटर टैंक में डूबकर मौत हो गई। इससे पहले गाजियाबाद के प्राइवेट स्कूल में एक बच्चा रहस्यमय मौत का शिकार हो चुका है।

    ऐसी घटनाओं के बाहर आने से इंसानियत तो शर्मशार हुई है. साथ ही इन सभी वारदातों से ये बात भी सामने आई है कि स्कूल में बच्चों की सुरक्षा किसके जिम्मे है? अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते हैं, इसी भरोसे के साथ कि घर के बाहर बच्चा स्कूल में सुरक्षित रहेगा. लेकिन उनके नौनिहालों के साथ इस तरह का कुकृत्य घट जाता है. इसकी जवाबदेही किसकी है?

  • पुलिस द्वारा अपने जुर्म को छिपाने की कोशिश- राज महाजन

    पुलिस द्वारा अपने जुर्म को छिपाने की कोशिश- राज महाजन

    क़ानून का काम होता है समाज की रक्षा करना और गुनह्गारों को सजा दिलाना. लेकिन आजकल के परिपेक्ष्य में क़ानून निर्दोष और मासूमों पर जुल्म करता दिख रहा है. जरा सोचिये अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए तो फिर समाज का क्या होगा? इस तरह से समाज गर्त में चला जायेगा.

    हाल ही में हुआ मंगलापुरी का संस्करण इसी बात की गवाही देता है कि पुलिस बन गयी है भक्षक. इस मामले में पुलिस एक महिला पत्रकार को जानवरों की तरह मारती है, उसका शोषण करती है, उसे मानसिक रूप से परेशान करती है. इतना ही नहीं अपनी दबंगई दिखाने के चक्कर में पुलिस उसको झूठे आरोपों के तहत फंसाने का प्रयास भी करती है.

    यह घटना घटी है न्यू मॉर्निंग की महिला पत्रकार प्रीती सुन्द्रियाल के साथ. DDA मंगलापुरी में अवैध रूप से रह रहे लोगों को उनकी झुग्गियों समेत वहां से हटाने गई थी. साथ में सरकारी काम सुचारू रूप से चले इसके लिए पुलिस भी तैनात थी. हालाँकि उस जमीन पर कोर्ट का स्टे ऑर्डर होने के बावजूद भी DDA वहां पहुँच जाता है. स्टे ऑर्डर के मुताबिक, नवम्बर तक लोगों को वहां से हटाया नहीं जा सकता.

    DDA ने अपना काम करना शुरू कर दिया और पुलिस वालों ने अपना. यहाँ न्यू मॉर्निंग की महिला पत्रकार घटना स्थल पर पहुंचकर अपना काम ही कर रही थी कि उसे पुलिस के जुर्म का शिकार होना पड़ा. पुलिस ने प्रीती पर डंडे बरसाए, लाते-घुसे बरसाए. यहाँ तक कि उसे चांटे भी मारे गये. एक महिला होने के बाद उस बुरी तरह से अपमानित किया गया बिना किसी अपराध के.

    इसके बाद शुरू हुआ पुलिस का असली खेल. घटना स्थल पर किसी उपद्रवी ने आग लगा दी जिससे लोग बेकाबू हो गये. इसका ठीकरा भी पुलिस वालों ने प्रीती के सर फोड़ा. पुलिस ने इसी बात का फयेदा उठाकर इस पूरे प्रकरण का इलज़ाम न्यू मॉर्निंग की महिला पत्रकार पर लगा दिया. उसके बाद उसे देशद्रोह और दंगा फ़ैलाने के आरोप में फंसाने के लिए पुलिस ने चालें चलनी शुरू कर दी.

    मारपिटाई के बाद महिला पत्रकार को पुलिस जबरन घसीटकर थाने ले जाती है और अपने जुर्म को छुपाने के लिए उससे एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराती है. यह हस्ताक्षर भी जबरन कराये जाते हैं यहाँ तक कि पत्रकार को पढ़ने तक नहीं दिया जाता. जाहिर सी बात है उन कागजों में कुछ तो ऐसा जरूर था जो पुलिस ने उसे पढ़ने नहीं दिया.

    इस पूरे प्रकरण में पुलिस का जो चेहरा सामने आया काफी भयानक और निंदनीय है. जिसे हमारी रक्षा का दायित्व सौंपा है वही हम पर प्रहार करे तो अंजाम अंत ही होगा.

    मैं इसकी घोर निंदा करता हूँ और चाहता हूँ कि पुलिस इस मामले पर अपनी जिम्मेदारी समझते हुए आरोपी पुलिस वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाये. क्यूंकि कानून के मुताबिक, किसी भी महिला पर पुरुष पुलिस हाथ नहीं उठा सकता. यहाँ तो महिला और पुरुष दोनों ने मारा है. यहाँ पुलिस दोषी है महिला पत्रकार बेगुनाह.

    इस वीभत्स प्रकरण में पुलिस अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करे और आरोपियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाही करे.

  • दमन महिलाओं का नहीं, पुरुषों का हो रहा है-राज महाजन

    दमन महिलाओं का नहीं, पुरुषों का हो रहा है-राज महाजन

    स्वतंत्रता के बाद, जब समाजीकरण का उदय हुआ तो उस समय महिलाओं की स्थिति बहुत खराब थी. महिला शोषित और अत्याचार का शिकार थी. उस बद्स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने क़ानून-व्यवस्था में महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान बनाए. महिलाओं को विशेषाधिकार दिए गए और महिलाओं ने तरक्की भी की. 

    लेकिन, अब समय बदल चुका है. महिलाओं की स्थिति हर मामले में अच्छी है. बल्कि, कुछ मामलों में महिलाएं पुरुषों से भी आगे बढ़कर हैं. अब महिलाओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं. गृहस्थी से आगे निकलकर महिलाओं की अब अपनी प्राथमिकताएं हैं. अब महिलाएं सुखी-समृद्ध परिवार का हिस्सा बनकर नहीं बल्कि खुद की एक अलग पहचान बनाकर जीना चाहती हैं. परिवार अब बिखराव की ओर हैं.

    इसी दौर में, अब महिलाओं की रूचि {शादी|विवाह) में नहीं है. अगर माता-पिता के दबाब में शादी करनी पड़ गयी या फिर मनमुताबिक परिवार नहीं मिला तो कानून के विशेषाधिकारों का प्रयोग कर परिवार-मर्दन करके महिलाएं अलग हो जाती हैं. ऐसी महिलाएं अपनी शादी तोड़ने के साथ-साथ क़ानून की सहायता से पति से आर्थिक फायदे लेते हुए अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की पूरी व्यवस्था कर लेती हैं. अबला नारी नहीं ‘पुरुष’ हो गया है. दमन महिलाओं का नहीं, पुरुषों का हो रहा है. 

    अब 'सिंगल-पैरेंट' का फैशन भी ज़ोरों पर है. शादियाँ टूटने का अनुपात पहले के मुकाबले बहुत ही ज़्यादा बढ़ चुका है जिसका कारण कहीं न कहीं महिलाओं के लिए बनाए गए क़ानून और विशेषाधिकार हैं. इन कानूनों का फायदा असली महिला पीड़ितों को कितना मिला है इसके आंकडें बहुत कम हैं. लेकिन, पुलिस थानों और कोर्ट में 94 प्रतिशत मामले झूठे दर्ज हो रहे हैं. इन कानूनों की वजह से, जो महिलाएं अपने पति, सास-ससुर के प्रति प्रेम-भाव रखते हुए, गृहस्थी का निर्वाह करती थी, उनमें अहंकार और दबंगई की भावना आ गयी. महिलायें मोर्चे की शुरुआत करती हैं बाकी का बचा-खुचा काम मीडिया कर देती है.

    महिला सशक्तिकरण के नाम पर मीडिया और फिल्मकारों ने इन महिलाओं को नकारात्मक सोच का चश्मा पहना दिया, जिसमें उन्हें अपनी परिवार के प्रति जिम्मेदारियां अब अत्याचार लगने लगीं हैं. जो महिलाएं अब तक गृहस्थी का निर्वाह करती थीं, वो घर का काम करने में अपने-आपको शोषित समझने लगीं हैं. जो महिलाएं ख़ुशी-ख़ुशी पति के साथ रहती थीं और सास-ससुर की सेवा करती थीं, उनको वही सब अब अपना अपमान और अत्याचार लगने लगा है. बस फिर क्या, अब लग गयी हैं महिलाएं अपने ऊपर हुए 'शोषण' और 'अत्याचार' का बदला लेने में.

    सुखी परिवार की परिभाषा अब 'सिंगल-पैरेंट' तक सीमित होती जा रही है. पुरुषों का दमन इस स्तर तक पहुँच गया कि उन्होंने क़ानून से लड़ने की बजाय टूटकर खुदख़ुशी जैसे निर्णयों को अपना लिया है. जो कुछ बहादुर थे उनको न्याय-व्यवस्था ने तोड़ दिया.

    जब कोई पुरुष किसी थाने में जाता है तो उसे यह सुनने को मिलता है, "भाई तेरा कुछ न होने का. तू अपनी शिकायत लिख कर दे दे. वो तो 'महिला' है उसकी पहले सुनी जायेगी." न्याय-व्यवस्था के संचालकों द्वारा खुलकर ऐसे पुरुषों पर आर्थिक और मानसिक अत्याचार होता है और वो पुरुष अपने-आपको सिर्फ कोसता रह जाता है.

     जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई युद्ध लड़ रही थीं तो महिला सशक्तिकरण जैसी कोई नीति नहीं थी और न ही क़ानून-व्यवस्था में कोई विशेषाधिकार. जिसे अत्याचार के खिलाफ लड़ना होता है, उसके लिए कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि अत्याचार के खिलाफ लड़ने के लिए मन की शक्तिका प्रबल होना ही काफी होता है. सोचने वाली बात यह है कि अगर समाज में सीता, अहिल्या जैसी देवियाँ थीं तो मंथरा, सुपर्न्खा, ताड़का जैसी शैतान औरतें भी थीं. 

    जब तक स्त्री-पुरुषों के लिए सामान अधिकार नहीं रखे जायेंगे, तब तक हम असल मायनों में विकसित नहीं माने जायेंगे. महिलाओं के लिए कानूनी-विशेषाधिकार इस समाज के लिए दीमक के सामान हैं, जो परिवार और समाज को अंदर ही अंदर खोखला करने का काम कर रहे हैं.