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शर्मनाक: NEET परीक्षा में छात्राओं के उतरवा लिए गए इनरवियर

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सरकारी और प्राइवेट मेडिकल काॅलेजों में एडमिशन के लिए 7 मई को नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट (NEET) हुआ. परीक्षा में किसी तरह की चीटिंग न हो इसके लिए कड़े इंतजाम किए गए. लेकिन जिस तरह की कार्रवाई केरल के कन्नूर में हुई वो बेहद शर्मनाक है.

नीट परीक्षा में सुरक्षा जांच के दौरान एक लड़की को बेहद शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा. लड़की को कथित रूप से एग्जाम हॉल में घुसने से पहले इनरवेयर उतारने को कहा गया. महिला सुरक्षाकर्मियों ने लड़की से अंडरगारमेंट्स उतारने को कहा, ताकि यह पता किया जा सके कि उसके पास कोई चीटिंग की सामग्री नहीं है.

लड़की ने आरोप लगाया कि प्रशासन के सख्त ड्रेस कोड के कारण अन्य लड़कियों को भी इसी शर्मनाक स्थिति से गुजरना पड़ा. परीक्षा के बाद लड़की ने मीडियाकर्मियों को इस घटना के बारे में बताया. बच्चों के साथ इस तरह की हरकत से अभिभावक भी काफी गुस्से में हैं.

लड़की की मां ने कहा, ‘मेरी बेटी एग्जाम सेंटर में गई. थोड़ी ही देर में वह लौटकर आई और उसने मुझे ब्रा दी. वो उससे सिर्फ इसलिए उतरवा दी गई, क्योंकि उसमें मेटल का हुक लगा हुआ था. फिर में करीब ढाई किलोमीटर दूर से एक लाइट कलर का लोअर खरीदकर लाई, क्योंकि डार्क कलर के कपड़े पहनने की भी इजाजत नहीं थी.

कन्नूर के एग्जाम हॉल में परीक्षा देने आई बाकि की लड़कियों के साथ कुछ इस तरह का ही व्यवहार किया गया. इनसे उनकी जींस के बटन हटाने को कहा गया. इसके बाद उन्हें नई ड्रेस खरीदकर लानी पड़ी. आईएएनएस के बातचीत में लड़की के पिता ने बताया कि उन्हें एग्जाम सेंटर से 3 किलोमीटर दूर एक कपड़े की दुकान पर उसके लिए एक पैंट खरीदकर लानी पड़ी. उन्होंने बताया, उसने जींस पहनी हुई थी. चूंकि उसमें जेबें और लोहे के बटन थे, इसलिए उसे उतारने को कहा गया.

नीट परीक्षा देशभर के 103 परीक्षा केन्द्रों पर 7  मई को मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए हुई थी. इसमें 11 लाख 35 हजार 104 स्टूडेंट शरीक हुए थे. यह पिछले साल इसी परीक्षा में शामिल हुए छात्र-छात्राओं की संख्या से 41.42 फीसदी ज्यादा था. नकल की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए सीबीएसई ने काफी सख्त गाइडलाइंस जारी की थीं. नियम के मुताबिक उम्मीदवारो को जूते पहनने की मनाही थी. केवल चप्पल ही पहनने की इजाजत दी गई थी. गर्ल्स स्टूडेंट्स साड़ी के बजाए साधारण सूट या जीन्स टी-शर्ट वह भी बगैर किसी तस्वीर या प्रिंट वाली पहन सकती थीं.

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  • यह राखी होगी “इज्ज़त वाली राखी”- राज महाजन

    यह राखी होगी “इज्ज़त वाली राखी”- राज महाजन

    भारत में हर परंपरा और त्योहारों को बड़ी ही मर्यादा के साथ निभाया जाता है. ऐसा ही एक मर्यादा से भरा त्यौहार है रक्षा-बंधन. गुजरे वक्त में इस शब्द का महत्व अपने चरम पर था. लेकिन आज के परिपेक्ष्य में ये भी बाकी त्योहारों की तरह कहीं अपनी मर्यादा और महत्व को खोता नज़र आ रहा है. 

    देखा जाए तो भारत में भाई-बहनों के बीच प्रेम और कर्तव्य इतना मज़बूत है कि ये रिश्ता किसी एक दिन की मोहताज नहीं है, लेकिन इस ख़ास दिन पर हर्षोल्लास देखते ही बनता है. राखी का पर्व सावन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. पवित्र दिन रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों की दाहिनी कलाई में राखी बांधती हैं, उनका तिलक करती हैं और उनसे अपनी रक्षा का संकल्प लेती हैं. हालाँकि, बदले दिनों में इस पर्व के भी मायने बदल चुके हैं और इसीलिए समाजशास्त्री विभिन्न स्तरों पर फिक्रमंद होते हैं, ताकि यह सुन्दर और अर्थपूर्ण पर्व अपना अस्तित्व न खो दे. 

    लेकिन विडंबना तो देखिये कहीं न कहीं से ऐसी तस्वीरें आ ही जाती हैं जिसमें समाज का भयंकर और घृणित चेहरा देखने को मिल ही जाता है. जहाँ बहनों, औरतों और महिलाओं की रक्षा करनी चाहिए वहीँ उनकी आबरू लूटी जाती है. उनके साथ इतना वीभत्स अत्याचार किया जता है कि इंसानियत ही शर्मसार हो जाए.

    सिर्फ अपनी बहन ही बहन नहीं होती अपितु समाज की हर लड़की को बहन के आईने से देखना चाहिए. औरत का दर्जा आदर का होता है. उसे उसी दर्जे से देखना चाहिए. हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में एक चर्चित और विवादित मॉडल 'कंदील बलोच' की उसके भाई ने ही 'ऑनर किलिंग' कर दी. पाकिस्तान में कहाँ तक इस वीभत्स घटना के जिम्मेदार लोगों पर ऊँगली उठाई जाती है बल्कि कई लोग इसके लिए कंदील बलोच के अश्लील और एक्सपोज़ करने वाले कृत्यों को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. ये बात भी बिलकुल सही है कि अश्लीलता को सराहा नहीं जा सकता लेकिन अश्लीलता की चादर ओढ़ कर किसी की हत्या करना सरासर गलत है. 

    मेरी नज़र में तो इस सबके लिए पुरुष ही दोषी है. पुरुष खुद अश्लील फिल्में देखते हैं, इंटरनेट पर सर्च करते हैं, दूसरी लड़कियों को वैसी ही नज़रों से घूरते हैं, छेड़ते हैं. लेकिन जब बात अपने घर की आती है, तो किसी कंदील को गला दबाकर मार डालते हैं, किसी अनीता को पेड़ से लटका दिया जाता है, किसी रजिया को जिंदा जला दिया जाता है. हमारे देश में कई चर्चित मामले ऐसे हुए हैं जहाँ जाति से बाहर प्रेम-विवाह करने पर लड़कियों को उनके ही परिवार के लोगों ने मार डाला. भारत में भी कई जगहों पर लड़कियों को प्रेम करने के जुर्म में उनके ही भाई, परिवार वाले मार डालते हैं.

    इसके उलट अगर ऐतिहासिक सन्दर्भों पर नज़र फिराई जाए तो रक्षाबंधन के किस्से हमारे इतिहास और हिंदू पौराणिक कथाओं में खूब सुनने मिलते हैं. मसलन एक युद्ध के समय मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेज कर मदद मांगी थी और हुमायूं जैसे शासक ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी. इतना ही नहीं, कहते हैं महान सिकंदर की पत्‍‌नी ने अपने पति के हिंदू-शत्रु पुरु को राखी बांधकर उसे अपना भाई बनाया था और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन भी लिया था. राजा पुरु ने इस वचन का मान भी रखा था और उन्होंने सिकंदर को जीवनदान भी दिया. 

    सिर्फ यही नहीं इसके अलावा भी हमारे इतिहास में ऐसी किस्सों की कोई कमी नहीं है. पूरा इतिहास ही ऐसे किस्सों से पटा पड़ा है. अगर इतिहास में ऐसा हो सकता है तो वर्तमान में क्यूँ नहीं? लेकिन लगता है इनसे कुछ सीख लेने की जगह हम सिर्फ औपचारिकता निभाने में लग जाते हैं. रक्षाबंधन के इस अनूठे उत्सव का ही तो यह कमाल है जो यह भाई-बहन के अटूट रिश्ते को मर्यादित करता है. किन्तु अन्य कई बुराइयों के साथ बेटी को गर्भ के अंदर ही मार दिया जाना आखिर रक्षाबंधन की गरिमा को कलंकित नहीं करता है तो और क्या करता है? माँ के गर्भ में अगर बेटी जिन्दा बच भी गयी तो समाज के दरिंदे उसे नोंच न लें इसका डर खाए जाता है और गनीमत रही दरिंदों की नज़र से बच गयी तो दहेज़ के लालची कुत्ते कुत्तों से कैसे बचेगी?

    ऐसी स्थिति में बहनों के लिए पर्व मानाने का दिखावा, औपचारिकता ही प्रतीत होता है, जब हम उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकते. अब चाहे वो अपनी बहन हो या किसी और की बहन हो, रक्षाबंधन तो सभी बहनों की रक्षा के दायित्व बोध कराता है. 

    तो इस रक्षाबंधन पर मेरे साथ प्रण लें कि अब से बहनों की रक्षा की सिर्फ बातें ही टीवी पर नहीं होंगी, बल्कि सही मायनों में हम अपनी ज़िन्दगी में भी इसे चरितार्थ करेंगे. ये करना मुश्किल नहीं है सिर्फ नजरिये भर का फर्क है. हमारी बहन की इज्ज़त ही इज्ज़त नहीं होती अपितु सभी महिलाओं को इज्ज़त से जीने का हक़ है. ये राखी होगी ‘इज्ज़त वाली राखी’. 

  • होली उन्माद, गरिमा और मर्यादा से भरा पर्व है, पहचाने इसकी सार्थकता

    होली उन्माद, गरिमा और मर्यादा से भरा पर्व है, पहचाने इसकी सार्थकता

    सारा...रा...रा...रा...जोगी जी, सारा...रा...रा...रा...फागुन मास की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मनाये जाने वाला होली का यह पावन त्यौहार सर्दी के अन्त और ग्रीष्म के प्रारम्भ के सन्धिकाल में तथा वसंत ऋतु की श्रीवृद्धि समृद्धि के मादक वातावरण में अपनी उपस्थिति देता है. फाल्गुन की पूर्णमासी को होने के कारण इसे फाग भी कहते हैं.

    पूर्णमासी से एक दिन पहले रात को लोग होली जलाते हैं और उसमें गेहूं की बालें तथा चने के छोले भुनते हैं. रंगों और संगीत का उन्माद लोगों को उत्साह और उमंग से भर देता है. वासंती पवन के साथ फागुनी रंगों की बौछार लिये होली का यह त्योहार प्रेम, हर्ष, उल्लास, हास्य विनोद, समानता चेतनता, जागति का पर्व है. यद्यपि इस पर्व के मनाये जाने के पीछे कुछ पौराणिक कथाएं हैं, तथापि इसे मनाये जाने के सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं. इस पर्व की सबसे ख़ास बात है कि यह मौसम और रंगों के अनुकूल होता है.

    होली के साथ एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है. एक राजा हिरण्यकष्यप था. जो चाहता था सभी उसे भगवान मानकर उसकी पूजा करें. उनका पुत्र प्रह्लाद उन्हें ईश्वर नहीं मानता था. बहुत समझाने पर भी वह नहीं समझा तो उन्होंने उसे मारने के कई उपाय किये, पर वह नहीं मरा. हिरण्यकष्यप की बहन होलिका को आग में न जलने का वर मिला हुआ था. होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गयी. ईश्वर की कृपा से होलिका जल गयी और प्रह्लाद सकुशल बच गया. इसी की याद में होली जलायी जाती है.

    इस पर्व को सम्पन्नता के लिहाज से भी बड़ा माना गया है. होली के अवसर पर किसानों की फसल पक जाती है. अतः लहलहाती फसलें देखकर किसान खुशी से झूम उठते हैं और आग में अनाज की बालों को भूनकर खाते एवं खिलाते हैं.

    अगले दिन सुबह अर्थात दुलहंडी के दिन होली खेली जाती है. सब लोग वैर-विरोध भूल कर एक दूसरे के गले मिलते हैं, मिठाइयां खाते और खिलाते हैं तथा प्यार के रंगों में रंग जाते हैं. सभी एक दूसरे पर रंग डालते और गुलाल मलते हैं. गुंजिया और तरह-तरह की मिठाइयों से वातावरण में मिठास घुल जाती है. इसलिए कहते हैं ‘बुरा न मानो...होली है’.

    होली की सार्थकता तब तक नहीं हो सकती जब तक इसमें भगवान श्रीकृष्ण की ब्रज की होली की बात न हो. ब्रज की होली तो सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में प्रसिद्ध है. वहाँ मनाई जाने वाली होली बेहद ख़ास होती है क्यूंकि स्वयं प्रभु इस उत्सव को बड़े ही चाव से मानते थे और कहा जाता है आज भी श्रीकृष्ण इस पर्व को मानने आते हैं.

    आज के परिपेक्ष्य में देखा जाए तो सभी वस्तुओं में मिलावट हो गयी है. आजकल अच्छे रंगों का प्रयोग न करके रासायनिक लेपनों, नशे आदि का प्रयोग करके इसकी गरिमा को समाप्त कर रहे हैं. आज के व्यस्त जीवन के लिए होली चुनौती है. इसे मंगलमय रूप देकर मनाया जाना चाहिए. तभी इसका भरपूर आनंद लिया जा सकेगा. इसके विपरीत पहले टेसू के रंगों का इस्तेमाल किया जाता था. कहते हैं टेसू के  प्रभाव से चेचक माता जैसी बीमारियों का शमन भी किया जाता है.

    होली का पर्व मनाये जाने के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व में से यह प्रमुख है कि होली समानता, सदभाव में वृद्धि करने, शत्रुता को मित्रता में बदलने का पर्व है. इस दिन छोटे-बड़े सभी अपनी सामाजिक पद-प्रतिष्ठा भूलकर मनोमालिन्य दूर करते हैं. अपने विरोधी भावों को छोड़ स्नेही भाव तरंगों में सराबोर हो हास्य-विनोद करते हैं, फगुवा गाते हैं .

    होली के इस पवित्र त्यौहार में समय परिवर्तन के साथ-साथ कुछ विकृतियों का प्रवेश हो गया है, जिसके फलस्वरूप ऐसा भी प्रतीत होता है कि कहीं हम इसके मूल स्वरूप को विस्मृत न कर जायें. होली के दिन स्वाभाविक सहज हास्य-विनोद के स्थान पर कुरुचिपूर्ण अश्लील, भद्दे, पतनकारी मनोभावों का प्रयोग होने लगा है. किसी सभ्य सुसंस्कृत समाज के लिए इसे छेड़छाड़ का रूप देना उचित नहीं है .

    कई अवसरों पर अपने से सम्मानीय स्त्रियों के प्रति अमर्यादापूर्ण आचरण करते हुए इसकी गरिमा, महता को यदूल जाते हैं. होलिका को गाली देने का आशय कुछ दूसरे अर्थो में लेने लगे हैं. कुछ तो होली के अवसर पर अपनी बुराइयों को पवित्र अग्नि में होम करने की बजाये प्रतिशोध की भावनाओं में जलकर अमानवीय कृत्य करते हैं. मदिरा और भांग का आवश्यकता से अधिक सेवन असन्तुलित बना देता है.

    यदि हम इन दोषों से दूर रहकर होली के वास्तविक परम्परागत स्वरूप को कायम रखते हैं, तो इस त्योहार की जो महिमा है, गरिमा है, वह बनी रहेगी; क्योंकि होली तो जीवन को उल्लासमय, उज्जल बनाने का पर्व है.

    यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारे देश ने त्योहारों की माला पहन रखी है. शायद कोई ऐसी महत्त्वपूर्ण अतिथि हो, जो किसी न किसी त्योहार, पर्व से सम्बन्धित न हो. छोटे-बड़े त्योहारों को लेकर चर्चा की जाए, तो हमारी सभी तिथियां किसी-न-किसी घटना का ही प्रतीक और स्मृति हैं. 

    यदि हम अपने पर्वों का सही मूल्यांकन करके उनकी गरिमा को बनाये रखेंगे तो उन्माद और हर्ष हमेशा बना रहेगा. 

  • अगर सुनार के धोखे से बचना है तो जाने क्या होती है 'एक्साइज ड्यूटी' (ED) ?

    अगर सुनार के धोखे से बचना है तो जाने क्या होती है 'एक्साइज ड्यूटी' (ED) ?

    मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने 10 ग्राम प्योर सोना 30000 रुपये का खरीदा. उस सोने को लेकर आप सुनार के पास हार बनवाने गए. सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनवाई लगेगी. आपने खुशी से कहा ठीक है. उसके बाद सुनार ने 1 ग्राम सोना निकाल लिया और 1 ग्राम का टांका लगा दिया. बिना टांके के आपका हार बन ही नहीं सकता ये तो सभी जानते हैं. 

    यानी अगर 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया और 2000 रुपये आपसे बनवाई अलग से लेली. तो सीधा-सीधा आपको 5000 रुपये का झटका लग गया. अब आपके 30 हजार रुपये सोने की कीमत मात्र 25 हजार रुपये बची और सोना भी 1 ग्राम कम होकर 9 ग्राम शेष बचा.  

    बात यहीं खत्म नहीं हुई. उसके बाद अगर आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या उसी सोने से कोई और आभूषण बनवाने पुन: उसी सुनार के पास जाते हैं तो वह पहले टांका काटने की बात करता है और सफाई करने के नाम पर 0.5 ग्राम सोना और कम हो जाता है

    अब आपके पास मात्र 8.5 ग्राम सोना ही बचता है. यानी कि 30 हजार का सोना अब बस 23500 रुपये का बचा.

    आप जानते होंगे कि,

    30000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनवाई = 32000 रुपये.

    1 ग्राम का टांका कटा 3000 रुपए + 0.5 ग्राम पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा मतलब सफाई के नाम पर = 1500 रुपये.

    शेष बचा सोना 8.5 ग्राम

    यानी कीमत 32000 - 6500 का घाटा = 25500 रुपये.

    यह वो था जो अब तक होता आया है. लेकिन इसके विपरीत भारत सरकार की मंशा क्या है? एक नज़र डालते हैं इस पर भी.

    एक्साइज ड्यूटी लगने पर सुनार को रसीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा. इतना ही नहीं जितने ग्राम का टांका लगेगा उसका सोने के तोल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

    जैसा कि आपके सोने का तोल 10 ग्राम है और टांका 1 ग्राम का लगा, तो सुनार को रसीद के आधार पर 11 ग्राम वजन करके उपभोक्ता को देना होगा. इससे उपभोक्ता को फायेदा होगा और सुनार अब तक जो प्रपंच करते आयें हैं उस पर लगाम लग सकेगी. इसीलिए सुनार हड़ताल पर है कि अब उनका धोखाधड़ी का भेद खुल जायेगा.