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डॉलीवुड

डांसिंग वायरस के ग्रांड फिनाले में खूब रही उभरते कलाकारों की धूम

भजनपुरा स्थित रोशन डांस स्टूडियो द्वारा आयोजित हर उम्र के प्रतिभागियों ने डांस के अलग-अलग रूप और प्रदर्शन से सभी को मोहित कर दिया. शो में बतौर जज वरिष्ठ कोरियोग्राफर रोशन खान, बुगी-वुगी मम्मी स्पेशल फेम ममता श्रीवास्तव, डांस फेम प्रदीप शर्मा और यूट्यूब फेम मैडी उपस्थित रहे. जह

मोक्ष म्युज़िक को मिला नया रॉकस्टार, राज महाजन की खोज ‘गायक कुमार सौरभ’

गायकी की दुनिया में राज महाजन ढूंढकर लाये हैं एक नयी खोज जिसका नाम है कुमार सौरभ. दिनांक 12 जनवरी, 2017 को 3 बजकर 33 मिनट पर कुमार सौरभ ने मोक्ष म्युज़िक कंपनी के दिल्ली स्थित ऑफिस में 5 साल के लिए सिंगिंग कॉन्ट्रैक्ट साईन किया. सौरभ झारखण्ड की आवाज़ की नाम से प्रसिद्ध हैं. अब म

मोक्ष म्युज़िक ने बदल दिया राज महाजन और बजरंगी भाईजान फेम मनोज बक्शी का लुक, देखें वीडियो

पेंटर के लिए पेंटिंग करना कोई बात नहीं. यहाँ कहने का मतलब है जो इंसान जिस चीज़ में माहिर हो उसके लिए उस काम को करना कोई बड़ी बात नहीं. बड़ी और ख़ास बात तब होती है जब कोई शख्स उस चीज़ को करता है जो उसने न की हो. तब उसका परिणाम अलग ही आता है और बेहद शानदार होता है.यहाँ बात हो र

टैलेंट को मंच देता राज महाजन का Dollywood Talent Club, जुड़ सकता है कोई भी हुनरमंद

दिल्ली के फेमस टैलेंट क्लब Dollywood Talent Club ने आयोजित की एक मस्ती भरी, मसालेदार और टैलेंट से भरपूर शानदार संगीत सभा. मोक्ष म्युज़िक और DTC के फाउंडर राज महाजन के वेलकम शब्दों के साथ शुरू हुई इस सभा का ख़ास आकर्षण रहा संदीप का मिमिक्री एक्ट. जी हाँ! इस बार फैशन

Dollywood Talent Club ने किया नए साल का स्वागत, राज महाजन ने दिया मॉडल्स को एक्टिंग का चांस

दिल्ली के फेमस टैलेंट क्लब DTC (Dollywood Talent Club) ने नए साल का स्वागत बड़े ही शानदार तरीके से किया. इस बार DTC की यह शाम संगीतमय तो रही लेकिन साथ में इस बार लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा फैशन शो. रैंप पर सभी मॉडल्स ने अपने टैलेंट को शोकेस किया. इंडि

2 दिन में एक लाख से भी ज्यादा व्यूज पार कर गया आईएस अधिकारी का चर्चित हो रहा यह गाना, राज महाजन ने दिया है संगीत और मोक्ष म्युज़िक से हुआ था रिलीज़ 'मजबूरियाँ'

इंतज़ार हुआ खत्म. अब सामने आ गया है मोक्ष म्युज़िक का बहुप्रतीक्षित गाना कैसी हैं मजबूरियां. आपको जानकर हैरानी होगी इस गानेने मोक्ष म्युज़िक के पिछले सभी गानों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. रिलीज़ के 2 दिन के भीतर ही इसने पार कर लिया एक लाख का जादुई आं

Video: राज महाजन लेकर आये हैं नया म्युज़िक विडियो, डांस के ज़रिये दिखाएँगे मजबूरियों में घिरा इंसान

अब इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म होने को हैं. आपके सामने आ रहा है मोक्ष म्युज़िक का मोस्ट अवैतिड गाना मजबूरियां. पिछले ही दिनों हमने आपको बताया था मोक्ष म्युज़िक रिलीज़ करने जा रहा है अपना डांस म्युज़िक विडियो. मजबूरियां जिसे अपनी आवाज़ से मखमली बनाया है (IAS) ड

Video: दिल्ली में DTC ने किया सुरमई शाम का आयोजन, बेहतरीन सुरों के साथ गुजरी एक और शाम, खाकी वर्दी ने किया मंच का संचालन

सुरों से झिलमिलाती एक शाम और इस शाम में कई फनकारों ने अपना जौहर दिखाया. गानों से सजी इस शाम का संचालन किया आकाशवाणी के सीनियर न्यूज़ एंकर आशुतोश जैन और दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर गिरीश सिंह ने. डॉलीवुड टैलेंट क्लब की इस बेहतरीन शाम के आयोजन का श्रेय जाता है

मोक्ष म्युज़िक लेकर आया है पंजाबी फ्लेवर्ड सॉंग (ब्लैक टॉप रेड जीन) सिंगर प्रदीप की आवाज़ में

पंजाबी में तड़ाम ते तुडूम करने के किये मार्किट में रिलीज़ हुआ है मोक्ष म्युज़िक का नया गाना. ब्लैक टॉप रेड जीन जिसे गाया है प्रदीप ने. प्रदीप ने इसे बहुत अच्छे तरीके से गाया है. पंजाबी भाषा में एक लड़का और लड़की के बीच मीठी सी नोंक-झोंक दिखाई है. कहते हैं पंजाबी भाषा

नोटों की सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर संगीतकार राज महाजन का अनोखे अंदाज़ में बना एक गाना “मोदी जी मोदी क्या कर डाला”

प्रधानमंत्री ने कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अनूठा ऐतिहासिक क़दम उठाया है. तत्काल प्रभाव से 500 और 1000 के नोटों को बंद कर दिया गया है. पूरे देश में एक बयार सी चल पड़ी है उनके इस कदम को लेकर. जिन लोगों को इस बदलाव की समझ है वो इसका समर्थन कर रहे हैं और जिन्हें इसकी समझ नहीं

पहली बार अपने म्युज़िक विडियो के ज़रिये 'डांसिंग कांसेप्ट' लेकर आ रहा है मोक्ष म्युज़िक

पिछले दिनों हमने आपको बताया था मोक्ष म्युज़िक रिलीज़ करने जा रहा है अपना न्यू सोंग. मजबूरियां जिसे अपनी आवाज़ से मखमली बनाया है (IAS) डॉ. हरिओम ने. किशोर द्वारा लिखे इस गाने को संगीतकार राज महाजन ने बड़ी ही शिद्दत से बनाया है. इस गाने से राज दिली तौर पर जुड़े है. उनका

पेश है राज महाजन की जिंदगी को पर्दे पर दर्शाता गाना “मजबूरियां”, डॉ. हरीओम (IAS) की मखमली आवाज़ में

आज रिलीज़ होने जा रही है संगीतकार राज महाजन की एक और नयी पेशकश. जो सीधा पहुंचेगी आपके दिलों तक. जिसे अपनी आवाज़ से मखमली बनाया है डॉ. हरिओम ने. आपको जानकार हैरानी होगी पेशे से डॉ. हरीओम एक आईएएस ऑफिसर हैं.इस गाने में कई ख़ास बातें हैं. गाने का नाम है मजबूरियां

धमाकेदार परफॉरमेंस के दम पर मानेसर में डंका बजाते दिखे Sachin Dev Mika (SDM)

NSG (National Security Guard) मना रहा था अपना 32 वीं वर्षगांठ. गुडगाँव के मानेसर में 16 अक्टूबर की शामNSG मना रहा था अपना32 वां राइजिंग डे नेशनल लेबल सेलिब्रेशन.फौजियों के इस सेलिब्रेशन में रंग ज़माने का सारा दारोमदार था सचिन देव मिका (SDM) और कॉमेडियन सिराज ख


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  • होली उन्माद, गरिमा और मर्यादा से भरा पर्व है, पहचाने इसकी सार्थकता

    सारा...रा...रा...रा...जोगी जी, सारा...रा...रा...रा...फागुन मास की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मनाये जाने वाला होली का यह पावन त्यौहार सर्दी के अन्त और ग्रीष्म के प्रारम्भ के सन्धिकाल में तथा वसंत ऋतु की श्रीवृद्धि समृद्धि के मादक वातावरण में अपनी उपस्थिति देता है. फाल्गुन की पूर्णमासी को होने के कारण इसे फाग भी कहते हैं.

    पूर्णमासी से एक दिन पहले रात को लोग होली जलाते हैं और उसमें गेहूं की बालें तथा चने के छोले भुनते हैं. रंगों और संगीत का उन्माद लोगों को उत्साह और उमंग से भर देता है. वासंती पवन के साथ फागुनी रंगों की बौछार लिये होली का यह त्योहार प्रेम, हर्ष, उल्लास, हास्य विनोद, समानता चेतनता, जागति का पर्व है. यद्यपि इस पर्व के मनाये जाने के पीछे कुछ पौराणिक कथाएं हैं, तथापि इसे मनाये जाने के सामाजिक, वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं. इस पर्व की सबसे ख़ास बात है कि यह मौसम और रंगों के अनुकूल होता है.

    होली के साथ एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है. एक राजा हिरण्यकष्यप था. जो चाहता था सभी उसे भगवान मानकर उसकी पूजा करें. उनका पुत्र प्रह्लाद उन्हें ईश्वर नहीं मानता था. बहुत समझाने पर भी वह नहीं समझा तो उन्होंने उसे मारने के कई उपाय किये, पर वह नहीं मरा. हिरण्यकष्यप की बहन होलिका को आग में न जलने का वर मिला हुआ था. होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गयी. ईश्वर की कृपा से होलिका जल गयी और प्रह्लाद सकुशल बच गया. इसी की याद में होली जलायी जाती है.

    इस पर्व को सम्पन्नता के लिहाज से भी बड़ा माना गया है. होली के अवसर पर किसानों की फसल पक जाती है. अतः लहलहाती फसलें देखकर किसान खुशी से झूम उठते हैं और आग में अनाज की बालों को भूनकर खाते एवं खिलाते हैं.

    अगले दिन सुबह अर्थात दुलहंडी के दिन होली खेली जाती है. सब लोग वैर-विरोध भूल कर एक दूसरे के गले मिलते हैं, मिठाइयां खाते और खिलाते हैं तथा प्यार के रंगों में रंग जाते हैं. सभी एक दूसरे पर रंग डालते और गुलाल मलते हैं. गुंजिया और तरह-तरह की मिठाइयों से वातावरण में मिठास घुल जाती है. इसलिए कहते हैं ‘बुरा न मानो...होली है’.

    होली की सार्थकता तब तक नहीं हो सकती जब तक इसमें भगवान श्रीकृष्ण की ब्रज की होली की बात न हो. ब्रज की होली तो सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में प्रसिद्ध है. वहाँ मनाई जाने वाली होली बेहद ख़ास होती है क्यूंकि स्वयं प्रभु इस उत्सव को बड़े ही चाव से मानते थे और कहा जाता है आज भी श्रीकृष्ण इस पर्व को मानने आते हैं.

    आज के परिपेक्ष्य में देखा जाए तो सभी वस्तुओं में मिलावट हो गयी है. आजकल अच्छे रंगों का प्रयोग न करके रासायनिक लेपनों, नशे आदि का प्रयोग करके इसकी गरिमा को समाप्त कर रहे हैं. आज के व्यस्त जीवन के लिए होली चुनौती है. इसे मंगलमय रूप देकर मनाया जाना चाहिए. तभी इसका भरपूर आनंद लिया जा सकेगा. इसके विपरीत पहले टेसू के रंगों का इस्तेमाल किया जाता था. कहते हैं टेसू के  प्रभाव से चेचक माता जैसी बीमारियों का शमन भी किया जाता है.

    होली का पर्व मनाये जाने के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्त्व में से यह प्रमुख है कि होली समानता, सदभाव में वृद्धि करने, शत्रुता को मित्रता में बदलने का पर्व है. इस दिन छोटे-बड़े सभी अपनी सामाजिक पद-प्रतिष्ठा भूलकर मनोमालिन्य दूर करते हैं. अपने विरोधी भावों को छोड़ स्नेही भाव तरंगों में सराबोर हो हास्य-विनोद करते हैं, फगुवा गाते हैं .

    होली के इस पवित्र त्यौहार में समय परिवर्तन के साथ-साथ कुछ विकृतियों का प्रवेश हो गया है, जिसके फलस्वरूप ऐसा भी प्रतीत होता है कि कहीं हम इसके मूल स्वरूप को विस्मृत न कर जायें. होली के दिन स्वाभाविक सहज हास्य-विनोद के स्थान पर कुरुचिपूर्ण अश्लील, भद्दे, पतनकारी मनोभावों का प्रयोग होने लगा है. किसी सभ्य सुसंस्कृत समाज के लिए इसे छेड़छाड़ का रूप देना उचित नहीं है .

    कई अवसरों पर अपने से सम्मानीय स्त्रियों के प्रति अमर्यादापूर्ण आचरण करते हुए इसकी गरिमा, महता को यदूल जाते हैं. होलिका को गाली देने का आशय कुछ दूसरे अर्थो में लेने लगे हैं. कुछ तो होली के अवसर पर अपनी बुराइयों को पवित्र अग्नि में होम करने की बजाये प्रतिशोध की भावनाओं में जलकर अमानवीय कृत्य करते हैं. मदिरा और भांग का आवश्यकता से अधिक सेवन असन्तुलित बना देता है.

    यदि हम इन दोषों से दूर रहकर होली के वास्तविक परम्परागत स्वरूप को कायम रखते हैं, तो इस त्योहार की जो महिमा है, गरिमा है, वह बनी रहेगी; क्योंकि होली तो जीवन को उल्लासमय, उज्जल बनाने का पर्व है.

    यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हमारे देश ने त्योहारों की माला पहन रखी है. शायद कोई ऐसी महत्त्वपूर्ण अतिथि हो, जो किसी न किसी त्योहार, पर्व से सम्बन्धित न हो. छोटे-बड़े त्योहारों को लेकर चर्चा की जाए, तो हमारी सभी तिथियां किसी-न-किसी घटना का ही प्रतीक और स्मृति हैं. 

    यदि हम अपने पर्वों का सही मूल्यांकन करके उनकी गरिमा को बनाये रखेंगे तो उन्माद और हर्ष हमेशा बना रहेगा. 

  • अगर सुनार के धोखे से बचना है तो जाने क्या होती है 'एक्साइज ड्यूटी' (ED) ?

    मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने 10 ग्राम प्योर सोना 30000 रुपये का खरीदा. उस सोने को लेकर आप सुनार के पास हार बनवाने गए. सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनवाई लगेगी. आपने खुशी से कहा ठीक है. उसके बाद सुनार ने 1 ग्राम सोना निकाल लिया और 1 ग्राम का टांका लगा दिया. बिना टांके के आपका हार बन ही नहीं सकता ये तो सभी जानते हैं. 

    यानी अगर 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया और 2000 रुपये आपसे बनवाई अलग से लेली. तो सीधा-सीधा आपको 5000 रुपये का झटका लग गया. अब आपके 30 हजार रुपये सोने की कीमत मात्र 25 हजार रुपये बची और सोना भी 1 ग्राम कम होकर 9 ग्राम शेष बचा.  

    बात यहीं खत्म नहीं हुई. उसके बाद अगर आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या उसी सोने से कोई और आभूषण बनवाने पुन: उसी सुनार के पास जाते हैं तो वह पहले टांका काटने की बात करता है और सफाई करने के नाम पर 0.5 ग्राम सोना और कम हो जाता है

    अब आपके पास मात्र 8.5 ग्राम सोना ही बचता है. यानी कि 30 हजार का सोना अब बस 23500 रुपये का बचा.

    आप जानते होंगे कि,

    30000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनवाई = 32000 रुपये.

    1 ग्राम का टांका कटा 3000 रुपए + 0.5 ग्राम पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा मतलब सफाई के नाम पर = 1500 रुपये.

    शेष बचा सोना 8.5 ग्राम

    यानी कीमत 32000 - 6500 का घाटा = 25500 रुपये.

    यह वो था जो अब तक होता आया है. लेकिन इसके विपरीत भारत सरकार की मंशा क्या है? एक नज़र डालते हैं इस पर भी.

    एक्साइज ड्यूटी लगने पर सुनार को रसीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा. इतना ही नहीं जितने ग्राम का टांका लगेगा उसका सोने के तोल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

    जैसा कि आपके सोने का तोल 10 ग्राम है और टांका 1 ग्राम का लगा, तो सुनार को रसीद के आधार पर 11 ग्राम वजन करके उपभोक्ता को देना होगा. इससे उपभोक्ता को फायेदा होगा और सुनार अब तक जो प्रपंच करते आयें हैं उस पर लगाम लग सकेगी. इसीलिए सुनार हड़ताल पर है कि अब उनका धोखाधड़ी का भेद खुल जायेगा.
     

  • स्वयं के उत्थान के लिए भाषा का विकास सबसे ज़रूरी : राज महाजन

    कहते हैं जिसने अपनी मातृभाषा में पकड़ मजबूत करली वही इंसान जीवन में सफल है और मातृभाषा के उत्थान के लिए हमें ही कदम उठाने पड़ेंगे. 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. हिंदी को राजभाषा का दर्जा हासिल है और हिंदी भारत में बोलचाल के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया था. हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. 

    1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हिंदी को जनमानस की भाषा बताया था. साल 1949 में स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जिसे भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में बताया गया है कि ‘संघ की राज-भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था. इसी वजह से इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया. लेकिन जब राजभाषा के रूप में हिंदी लागू की गई तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोगों के बीच से विरोध के सुर भी उठने लगे और फिर अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा. यही कारण रहा है कि हिन्दी में भी अंग्रेजी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा.

    आज पूरा विश्व ग्लोबल हो गया है. इस दौर में भाषा ने भी अपना रूप बदल लिया है. हिंदी की जगह अंग्रेजी हो गया है. मज़े की बात है जिसे हिंदी नहीं बोलनी आती उसे भी अच्छी नौकरी मिलती है क्यूंकि उसे अंग्रेजी बोलनी आती है. हिंदी आये या न आये, लेकिन “इंग्लिश” आनी ज़रूरी है. अपनी ही भाषा का अपने ही देश में इस तरह से ह्रास होना निंदनीय है.

    1991 के बाद भारत में नव-उदारीकरण की आर्थिक नीतियां लागू की गई. नई प्रौद्योगिकी और इससे उपजते हुये सेवा और उद्योग देश की अर्थ, नीति में कई सारे महत्वपूर्ण बदलाव हुए. इस बदलाव का भाषा पर भी जबरदस्त असर पड़ा. अंग्रेजी के अलावा किसी दूसरे भाषा की पढ़ाई को समय की बर्बादी समझा जाने लगा. जब हिन्दी भाषी घरों में बच्चे हिन्दी बोलने से कतराने लगे, या अशुद्ध बोलने लगे तब कुछ विवेकी अभिभावकों के समुदाय को एहसास होने लगा कि घर-परिवार में नई पीढ़ियों की जुबान से मातृभाषा उजड़ने लगी है. इसलिए हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए राजभाषा सप्ताह या हिंदी पखवाड़ा मनाया जाने लगा. इस पूरे सप्ताह सरकारी विभागों और विद्यालयों में अलग-अलग प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है ताकि हिंदी को बढ़ावा दिया जा सके और ज़्यादा लोग इसका प्रयोग उतने ही स्वाभिमान से करे जैसे इंग्लिश का करते हैं. 

    आज सभी जगहों पर इंग्लिश के साथ-साथ हिंदी का चलन भी बढ़ा है. लेकिन नई पीढ़ी कहीं इससे पूरी तरह से वंचित न रह जाए इसलिए समाज का बुद्धिजीवी वर्ग इसके लिए प्रयास कर रहा है. हर तबका अपने-अपने हिसाब से हिंदी का उत्थान करने का प्रयास कर रहा है. कवि अपनी कविताओं के ज़रिये, साहित्यकार अपने साहित्य के ज़रिये, शिक्षक अपनी विद्या के ज़रिये और घर में माता-पिता अपने संस्कारों के ज़रिये. ऐसा ही एक छोटा सा प्रयास मैंने भी किया है और आगे भी करता रहूँगा. मैं राज महाजन अपने तरीके से हिंदी के उत्थान में जुड़ा हूँ. हो सकता है मेरा करना काफी नहीं होगा. लेकिन मैंने अपने ही बूते पर एक शुरुआत की है जिससे मैं आने वाली पीढ़ी को हिंदी का महत्व समझा सकूँ. मेरा मानना है अगर समाज को उन्नत और उत्कृष्ट बनाना है तो पहले अपनी जड़ों को मजबूत और संमृद्ध बनाना होगा. इसके लिए भाषा को पतन से बचाना होगा. ज़रूरी नहीं कि उत्थान तभी होगा जब हम रोज हिंदी बोलेंगे. उत्थान तब होगा जब हिंदी बोलने पर शर्म महसूस नहीं करेंगे. पूरी आत्मीयता से हिंदी को अपनाएंगे, हिंदुत्व का विकास हिंदी से ही होगा. आज हिंदी दिवस पर मैं सभी को इस ओर प्रेरित करता हूँ और आने वाली पीढ़ी से एक 
    गुज़ारिश करता हूँ कि अंग्रेजी का प्रयोग तो करें लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें जिनमें  हिन्द और हिंदी समाई है. हिंदी से जुड़ना मेरे लिए गौरव का विषय है.